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बीकानेर की वीरांगना – वीर राजपूत नारी की लोक कथा

बीकानेर की वीरांगना – वीर राजपूत नारी की लोक कथा

अपने सतीत्व और पतिव्रता – धर्म की रक्षा करना ही भारतीय स्त्रियों के जीवन का एक अनुपम और पवित्र आदर्श रहा है। उनके सतीत्व के वज्राघात से बड़े-बड़े साम्राज्यों की नींव हिल उठी, राजमुकुट धूलि में लोटने लगे, मानव – वेषधारी दानवों की दानवता और व्यभिचारमूल्क अत्याचार का अन्त हो गया। किरण देवी या राजरानी किरण देवी मेवाड़ सूर्य महाराणा प्रताप के भाई शक्तिसिंह की कन्या थी; उसका विवाह बीकानेर नरेश के भाई उन महाराज पृथ्वी सिंह से हुआ था, जिनकी कविता ने राणा प्रताप में पुन: राजपूती का जोश ला दिया था और फिर उनहोंने किसी भी हालत में अकबर से संधि की बातचीत नहीं की थी।

अकबर की विषैली राजनीति के क्लोरोफार्म से मतवाले होकर बड़े-बड़े राजपूत-घरानों ने अपनी सांस्कृतिक परम्परा और मान-सम्मान की उपेक्षा करना आरंभ कर दिया था, मेवाड़ छोडकर अन्य राजपूत रियासतों ने अकबर का लोहा मान लिया था। पृथ्वीराज अपनी इस वीर रानी के साथ दिल्ली में ही रहते थे। किरण देवी परम सुन्दरी और सुशीला थीं। अकबर उसे अपनी वासना का शिकार बनाना चाहता था। वह शक्तिशाली सम्राट अवश्य था, किंतु कामाग्री भी उसके हृदय में रात-दिन धधका करती थी। दिल्ली के शक्तिशाली सम्राट की अभिलाषाओं की पूर्ति में बाधक होने के लिये काफी शक्ति और साधनसम्पन्नता की आवश्यकता थी।

अपनी विषय-वासना की तृप्ति के लिये ही अकबर हर साल दिल्ली में ‘नौरोज’ का मेला लगवाता था। राजपूतों की तथा दिल्ली की अन्य स्त्रियाँ इस मेले के बाजार में जाया करती थीं। पुरुषों को मेले में जाने की आज्ञा नहीं थी। अकबर स्त्री के वेश में इस मेले में घुमा करता था। जिन सुन्दरी पर अकबर मुग्ध हो जाता था, उसे उसकी कुट्टीनियाँ फँसाकर उसके राजमहल में ले जाती थीं।

अकबर की आँखे बहुत दिनों से किरण देवी पर लगी हुई थी। उसे सिसोदिया राजघराने की सिंहनी की वीरता का पता नहीं था। वह नहीं जनता था कि भारतीय नारियों ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिये अपने प्राणों तक की चिता में जल-जलकर बलिदान कर दिया है। महारानी पद्मिनी की चिता की जलती राख का दर्शन उसकी पापी आँखों ने नहीं किया था।

बीकानेर की वीरांगना – वीर राजपूत नारी की लोक कथाएक दिन जब ‘नौरोजी’ के मेले में मीनाबाजार की सजावट देखने के लिये किरण देवी आयी तो कुट्टीनियों ने अकबर के संकेत से उस पतिव्रता को धोखे से जनाने महल पर पहुँचा दिया। विषयान्ध पामर अकबर ने उसे घेर लिया और नाना प्रकार के प्रलोभन दिये। किरण देवी की तेजस्विता की प्रखर किरणों से अकबर की कामवासना भभकती जा रही थी। ज्यों ही उसने उस राजपूत रमणिका अंग स्पर्श करने के लिये हाथ हिलाया, त्यों ही उस रणचण्डी ने कमर से तेज कटार निकाली और शुभ-निशुम्भ की तरह उसे धरती पर पटककर छाती पर पैर रखकर कहा – ‘नीच! नराधम! भारत का सम्राट होते हुए भी तूने इतना बड़ा पाप करने की कुचेष्टा की! भगवान ने सती साध्वियों की रक्षा के लिये तुझे बादशाह बनाया है और तू उनपर बलात्कार करता है! दुष्ट! अधम! तू बादशाह नहीं, नीच विषयी कुत्ता है, पिचाश है; तुझे पता नहीं कि मैं किस कुल की कन्या हूँ। सारा भारत तेरे पाँवों पर सिर झुकता है; परंतु मेवाड़ का सिसोदिया-वंश अभी अपना सिर ऊँचा खड़ा है। मैं उसी पवित्र राजवंश की कन्या हूँ। मेरी धमनियों में बप्पा रावल और साँगा का रक्त है। मेरे अंग-अंग में पावन क्षत्रिय वीरांगनाओं के चरित्र की पवित्रता है। तू बचना चाहता है तो मन में सच्चा पश्चाताप करके अपनी माता की शपथ खाकर प्रतिज्ञा कर कि अब से ‘नौरोजी’ का मेला नहीं होगा और किसी भी नारी की आबरू पर तू मन नहीं चलावेगा। नहीं तो, आज इसी तेज धार कटार से तेरा काम तमाम करती हूँ।’

अकबर के शरीर का खून सुख गया। पानीपत, मालवा, गुजरात और खान देश के सेना नायक के दोनों हाथ थरथर काँपने लगे। उसने करुण स्वर में बड़ा पश्चात्ताप करते हुए हाथ जोडकर कहा, ‘मा! क्षमा कर दो, मेरे प्राण तुम्हारे हाथों में हैं, पुत्र प्राणों की भीख चाहता है। उसने प्रण किया कि ‘अब नौरोज का मेला और मीना बाजार अकबर के चरित्र के बड़े कलंक हैं, जिन्हें इतिहासकार कभी नहीं भूल सकते हैं।  किरण देवी सतीत्व की प्रखर किरण थी, जिसके आलोक ने सारे देश को पतिव्रत्य की आभा से जगमगा दिया।

कुछ इतिहासकरों का मत है कि किरण देवी का नाम जयावती (या जोशीबाई) था। नाम कुछ भी हो, काम से ही लोगों की प्रसिद्धि होती है। इतना तो है कि बीकानेर नरेश पृथ्वीराज की राजरानी के पतिव्रता-धर्म ने दुराचारी अकबर को विवश किया कि वह उसे ‘मा’ कहे। इतिहास ने दिखला दिया कि अबला कहलाने वाली नारी कितनी बलवती होती है।

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