Home » Rajiv Krishna Saxena

Rajiv Krishna Saxena

प्रो. राजीव कृष्ण सक्सेना - जन्म 24 जनवरी 1951 को दिल्ली मे। शिक्षा - दिल्ली विश्वविद्यालय एवं अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में। एक वैज्ञानिक होने पर भी प्रोफ़ेसर सक्सेना को हिंदी सहित्य से विशेष प्रेम है। उन्होंने श्रीमद भगवतगीता का हिंदी में मात्राबद्ध पद्यानुवाद किया जो ''गीता काव्य माधुरी'' के नाम से पुस्तक महल दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुआ है। प्रोफ़ेसर सक्सेना की कुछ अन्य कविताएँ विभिन्न पत्रिकाओं मे छप चुकी हैं। उनकी कविताएँ लेख एवम गीता काव्य माधुरी के अंश उनके website www.geeta-kavita.com पर पढ़े जा सकते हैं।

गया साल: राजीव कृष्ण सक्सेना

Hindi Poem about Demonetization & New Year गया साल

यूँ तो हर साल गुजर जाता है अबकी कुछ बात ही निराली है कुछ गए दिन बहुत कठिन गुजरे मन मुरादों की जेब खाली है। कि एक फूल जिसका इंतजार सबको था उसकी पहली कली है डाली पर दिल में कुछ अजब सी उमंगें हैं और नजरें सभी की माली पर कि एक फूल जिसका इंतजार सबको था उसकी खुशबू …

Read More »

एक पूरा दिन: राजीव कृष्ण सक्सेना

एक पूरा दिन: राजीव कृष्ण सक्सेना

आज नहीं धन आशातीत कहीं से पाया‚ ना हीं बिछड़े साजन ने आ गले लगाया। शत्रु विजय कर नहीं प्रतिष्ठा का अधिकारी‚ कुछ भी तो उपलब्धि नहीं हो पाई भारी। साधारण सा दिन‚ विशेष कुछ बात नहीं थी‚ कोई जादू नहीं‚ नयन की घात नहीं थी। झलक नहीं पाते जो स्मृति के आभासों में‚ जिक्र नहीं होता है जिनका इतिहासों …

Read More »

कृष्ण मुक्ति: राजीव कृष्ण सक्सेना

कृष्ण मुक्ति: राजीव कृष्ण सक्सेना

कितना लम्बा था जीवन पथ, थक गए पाँव डेग भर भर कर, ढल रही साँझ अब जीवन की, सब कार्य पूर्ण जग के इस पल। जान मानस में प्रभु रूप जड़ा, यह था उत्तरदायित्व बड़ा, सच था या मात्र छलावा था, जनहित पर मैं प्रतिबद्ध अड़ा। अब मुक्ति मात्र की चाह शेष, अब तजना है यह जीव वेश, प्रतिविम्ब देह …

Read More »

देश मेरे: राजीव कृष्ण सक्सेना

देश मेरे - राजीव कृष्ण सक्सेना

मैं तज कर जा नहीं सकता तुझे ओ देश मेरे, बुलाएं लाख ललचायें मुझे परदेश डेरे, इसी पावन धरा पर हो मगन संतुष्ट हूँ मैं, लुभा नहीं सकते धन धान्य महलों के बसेरे। जुड़ा हूँ मैं अमिट इतिहास से कैसे भुला दूँ? जो जागृत प्रीत की झंकार वह कैसे सुला दूँ? जो घुट्टी संग भारत वर्ष की ममता मिली थी, …

Read More »

दीवाली आने वाली है: राजीव कृष्ण सक्सेना

दीवाली आने वाली है - राजीव कृष्ण सक्सेना

मानसून काफूर हो गया रावण का भी दहन हो गया ठंडी–ठंडी हवा चली है मतवाली अब गली–गली है पापा, मम्मी, भैय्या, भाभी बूआ, चाचा, दादा, दादी राह सभी तकते हैं मिल कर हर मन को भाने वाली है दीवाली आने वाली है चॉकलेट को छोड़ो भाई देसी है दमदार मिठाई लड्डू, पेड़ा, कलाकंद है बरफी दानेदार नरम है गरम जलेबी, …

Read More »

Nostalgia Hindi Poem on Helplessness विवशता

Nostalgia Hindi Poem on Helplessness विवशता

इस बार नहीं आ पाऊँगा… पर निश्चय ही यह हृदय मेरा, बेचैनी से अकुलाएगा, कुछ नीर नैन भर लाएगा, पर जग के कार्यकलापों से, दायित्वों के अनुपातों से, हारूँगा जीत न पाऊँगा। इस बार नहीं आ पाऊँगा… जब संध्या की अंतिम लाली, नीलांबर पर बिछ जाएगी, नभ पर छितरे घनदल के संग, जब सांध्य रागिनी गाएगी, मन से कुछ कुछ …

Read More »

निष्क्रियता – राजीव कृष्ण सक्सेना

निष्क्रियता - राजीव कृष्ण सक्सेना

कहां तो सत्य की जय का ध्वजारोहण किया था‚ कहां अन्याय से नित जूझने का प्रण लिया था‚ बुराई को मिटाने के अदम उत्साह को ले‚ तिमिर को दूर करने का तुमुल घोषण किया था। बंधी इन मुठ्ठियों में क्यों शिथिलता आ रही है? ये क्यों अब हाथ से तलवार फिसली जा रही है? निकल तरकश से रिपुदल पर बरसने …

Read More »

मदारी का वादा – राजीव कृष्ण सक्सेना

मदारी का वादा - राजीव कृष्ण सक्सेना

बहुत तेज गर्मी है आजा सुस्ता लें कुछ पीपल की छैयां में पसीना सुख लें कुछ थका हुआ लगता है मुझे आज बेटा तू बोल नहीं सकता पर नहीं छुपा मुझसे कुछ कितनी ही गलियों में कितने चुबारों में दिखलाया खेल आज कितने बाज़ारों में कितनी ही जगह आज डमरू डम डम बोला बंसी की धुन के संग घुमा तू …

Read More »

क्या करूँ अब क्या करूँ – राजीव कृष्ण सक्सेना

क्या करूँ अब क्या करूँ - राजीव कृष्ण सक्सेना

माम को मैं तंग करूँ या डैड से ही जंग करूँ मैं दिन रहे सोता रहूँ फिर रात भर रोता रहूँ पेंट बुक दे दो जरा तो रंग कागज पर भरूँ या स्काइप को ही खोल दो तो बात नानी से करूँ मैं बाल खीचूं माम के की ले चलो बाहर मुझे या झूल जाऊं मैं गले से कोई ना …

Read More »

रिम झिम बरस रहा है पानी – राजीव कृष्ण सक्सेना

रिम झिम बरस रहा है पानी - राजीव कृष्ण सक्सेना

गड़ गड़ गड़ गड़ गरज गरज घन चम चम चमक बिजुरिया के संग ढम ढम ढम ढम पिटा ढिंढोरा झूम उठा सारा जन जीवन उमड़ घुमड़ कर मेघों नें अब आंधी के संग करी चढ़ाई तड़क तड़क तड़िता की सीढ़ी उतर गगन से वर्षा आई अरसे से बेहाल धरा पर सूखे वृक्षों पर खेतों पर झूम बदरिया छाई घिर घिर …

Read More »