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Tag Archives: Devotional poems for Recitation

Ramdhari Singh Dinkar Old Classic Poem about Himalayas मेरे नगपति! मेरे विशाल!

Ramdhari Singh Dinkar Old Classic Poem about Himalayas मेरे नगपति! मेरे विशाल!

Here is excerpt from an old classic from Dinkar, exhorting Himalaya the great snow-covered king of mountains (Nagpati), that stands tall and eternally on the north of Indian subcontinent, to save India from its decline. The poem seems to have been written while India was under captivity of the English. मेरे नगपति! मेरे विशाल!: रामधारी सिंह दिनकर मेरे नगपति! मेरे विशाल! …

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Thai Pongal: English poem on Pongal Festival

Thai Pongal - English poem on Pongal Festival

Milk Rice the Golden child came – granting immeasurable ecstasy in her cooking Farmers with the beauty of lion dream a picturesque memory this new year gleam. Elevated threshing floor courtyard the face-where month of January gave love’s kiss with rice share abundance in red rice and charity – sweet to the tongue January child glad to meet. With the …

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हुल्ले नी माइ हुल्ले दो बेरी पत्ता झुल्ले: लोहड़ी लोक गीत

Lohri Folk Song हुल्ले नी माइ हुल्ले दो बेरी पत्ता झुल्ले

Lohri is a popular winter time Punjabi folk festival, celebrated primarily by Sikhs and Hindus from the Punjab region in the northern part of Indian subcontinent. The significance and legends about the Lohri festival are many and these link the festival to the Punjab region. Many people believe the festival commemorates the passing of the winter solstice. Lohri marks the …

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सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन बेचारा हो: लोहड़ी लोक गीत

Lohri Folk Song सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन बेचारा हो

सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन बेचारा होदुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले ती विआई हो,शेर शकर पाई हो, कुड़ी दे जेबे पाई हो,कुड़ी कौन समेटे हो, चाचा गाली देसे होचाचे चुरी कुटी हो, जिम्मीदारा लूटी हो,जिम्मीदार सुधाये हो, कुड़ी डा लाल दुपटा हो,कुड़ी डा सालू पाटा हो, सालू कौन समेटे हो,आखो मुंडियों ताना ‘ताना’, बाग़ तमाशे जाना ‘ताना’,बागों मनु कोडी लबी …

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मकई दा दाना, आना ले के जाना: लोहड़ी लोक गीत

Lohri Folk Song मकई दा दाना, आना ले के जाना

मकई दा दाना, आना ले के जाना “Mukai da dana, Aana lei ke janahulle hulareasi ganga chalesas sora chalejeth jathani chaledyor darani chalepairi shaunkan chalihulle hulareasi ganga pohnchesas sora pohnchejeth jathani pohnchedyor darani pohnchepairi shaunkan pohnchihulle hulareasi ganga nahte shava or hullejeth jathani nahtedyor darani nahtepairi shaunkan nahtiihulle hulareshaunkan paili paurishaunkan duji paurishaunkan tiji paurimaiti dhakka dittashaukan vichhe rud gayihulle …

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लो आ गयी लोहड़ी वे: जावेद अख्तर

लो आ गयी लोहड़ी वे - जावेद अख्तर

लो आ गयी लोहड़ी वे,बना लौ जोड़ी वे,कलाई कोई यू थामो, ना जावे छोड़ी वे,ना जावे छोड़ी वेछूठ ना बोली वे,कुफर ना टोली वे,जो तुने खायी थी कसमे, इक इक तोड़ी वे,इक इक तोड़ी वेलो आ गयी लोहड़ी वे,बना लो जोड़ी वे…तेरे कुर्बान जावा, तेरी मर्ज़ी जान जावा,तोह हर बात मान जावा, तेरी सोनिये…ओय-ओय-ओय तेरे कुर्बान जावातेनु मै जान-दिया, खूब …

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स्वामी विवेकानंद के भाषण पर प्रेरणादायक कविता

Swami Vivekananda

शिकागो धर्म सम्मेलन,1893 में दिया गया भाषण अमरीकी भाई बहनो कह, शुरू किये जब उद्बोधन। धर्म सभा स्तब्ध हुई थी, सुनकर उनका सम्बोधन॥आया उस प्राचीन देश से, जो संतो की है नगरी। पाया हूँ सम्मान यहाँ जो, भरी हर्ष से मन गगरी॥मेरा है वो धर्म जिसे सब, कहते धर्मो की माता। धरा गगन में होने वाली, हर हलचल की वो ज्ञाता॥करता हूँ नत …

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स्वामी विवेकानंद जी की कविता: सागर के वक्ष पर

युवा दिवस: स्वामी विवेकानंद जयंती पर जानकारी

सागर के वक्ष पर: स्वामी विवेकानंद जी नील आकाश में बहते हैं मेघदल,श्वेत कृष्ण बहुरंग,तारतम्य उनमें तारल्य का दीखता,पीत भानु-मांगता है विदा,जलद रागछटा दिखलाते।बहती है अपने ही मन से समीर,गठन करता प्रभंजन,गढ़ क्षण में ही, दूसरे क्षण में मिटता है,कितने ही तरह के सत्य जो असम्भव हैं –जड़ जीव, वर्ण तथा रूप और भाव बहु।आती वह तुलाराशि जैसी,फिर बाद ही …

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काली माता: स्वामी विवेकानंद की कविता

काली माता: स्वामी विवेकानंद छिप गये तारे गगन के,बादलों पर चढ़े बादल,काँपकर गहरा अंधेरा,गरजते तूफान में, शतलक्ष पागल प्राण छूटेजल्द कारागार से–द्रुमजड़ समेत उखाड़कर, हरबला पथ की साफ़ करके।शोर से आ मिला सागर,शिखर लहरों के पलटतेउठ रहे हैं कृष्ण नभ कास्पर्श करने के लिए द्रुत,किरण जैसे अमंगल कीहर तरफ से खोलती हैमृत्यु-छायाएँ सहस्रों,देहवाली घनी काली।आधिन्याधि बिखेग्ती, ऐनाचती पागल हुलसकरआ, जननि, …

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