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Tag Archives: Destination Hindi Poems

जानते हो क्या क्या छोड़ आये: राज कुमार

जानते हो क्या क्या छोड़ आये: राज कुमार

Dr. Raj Kumar is a retired Indian professor of psychiatry. He is also a poet of an era bygone. I enjoyed hearing some of his poems in person. Here is a sample poem that exhorts those who left home in pursuit of riches, to return home. एक चिट्ठी, कुछ तस्वीरें लाया हूँ देखोगे? दिखलाऊँ? बूझोगे? बतलाऊँ? जानते हो क्या क्या …

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उठो स्वदेश के लिये: क्षेमचंद सुमन की देशभक्ति कविता

उठो स्वदेश के लिये – क्षेमचंद सुमन

Here is a great poem from which inspiration may be derived. Author is the well-known poet Kshem Chand Suman. उठो स्वदेश के लिये बने कराल काल तुम उठो स्वदेश के लिये बने विशाल ढाल तुम उठो हिमाद्रि श्रंग से तुम्हे प्रजा पुकारती उठो प्रशांत पंथ पर बढ़ो सुबुद्ध भारती जागो विराट देश के तरुण तुम्हें निहारते जागो अचल, मचल, विफल, …

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बढ़े चलो, बढ़े चलो: सोहनलाल द्विवेदी

बढ़े चलो, बढ़े चलो - सोहन लाल द्विवेदी

सोहन लाल द्विवेदी (22 फरवरी 1906 – 1 मार्च 1988) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे। ऊर्जा और चेतना से भरपूर रचनाओं के इस रचयिता को राष्ट्रकवि की उपाधि से अलंकृत किया गया। महात्मा गांधी के दर्शन से प्रभावित, द्विवेदी जी ने बालोपयोगी रचनाएँ भी लिखीं। 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया था। न हाथ …

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विद्रोह: प्रसिद्ध नारायण सिंह जी की भोजपुरी कविता

विद्रोह - प्रसिद्ध नारायण सिंह

I recently visited Jhansi and as I am a great admirer or Rani Laxmibai, I went to see her palace, Jhansi Fort and museum. In the museum, I found a very nice poetry book related to the first freedom fight of India in 1857. In this book I found a truly remarkable poem in Bhojpuri, that immediately reminded me of …

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झाँसी की रानी: सुभद्रा कुमारी चौहान की वीर रस कविता

Subhadra Kumari Chauhan Veer Ras Hindi Poem झाँसी की रानी

Subhadra Kumari Chauhan has authored a number of popular works in Hindi poetry. Her most famous composition is Jhansi Ki Rani, an emotionally charged poem describing the life of Rani Lakshmi Bai. The poem is one of the most recited and sung poems in Hindi literature. This and her other poems, Veeron Ka Kaisa Ho Basant, Rakhi Ki Chunauti, and …

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मेरा परिचय: अटल जी की हिंदुत्व पर देश प्रेम कविता

Atal Bihari Vajpayee Inspirational Desh Bhakti Poem मेरा परिचय

महाकवि डॉ. गोपालदास नीरज जितने साहित्य के मर्मज्ञ थे, उतने ही ज्योतिष शास्त्र में भी पारंगत। गुरुवार को अटलजी के निधन के साथ महाकवि की भविष्यवाणी भी सच साबित हो गई। दरअसल, नीरजजी ने नौ साल पहले 2009 में यह भविष्यवाणी की थी कि मेरे और अटलजी के निधन में 30 दिन से ज्यादा का अंतर न रहेगा। हुआ भी …

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झुक नहीं सकते: अटल बिहारी वाजपेयी की यादगार कविता

Atal Bihari Vajpayee Inspirational Desh Prem Poem झुक नहीं सकते

देश के पूर्व प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी की आधारशिला माने जाने वाले पार्टी के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी अपनी हाजिर जवाबी से हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। उन्होंने न केवल एक बेहतरीन राजनेता बल्कि एक अच्छे कवि, पत्रकार और लेखक के रूप में नाम कमाया बल्कि एक शानदार वक्ता के रूप में भी लोगों का दिल जीता। अटल …

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कदम मिलाकर चलना होगा: अटल की देशभक्ति कविता

कदम मिला कर चलना होगा: अटल बिहारी वाजपेयी

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक अच्‍छे राजनेता के साथ ही बहुत अच्‍छे कवि भी थे। संसद से लेकर अन्‍य मौकों पर अपनी चुटीली बातों को कहने के लिए अक्‍सर कविताओं का इस्‍तेमाल करते थे। उनका मौकों के हिसाब से कविताओं का चयन उम्‍दा रहता था, जिसको अक्‍सर विरोधी भी सराहा करते थे। कदम मिलाकर चलना होगा: अटल …

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सिंधु में ज्वार: अटल बिहारी वाजपेयी की देश प्रेम कविता

सिंधु में ज्वार – अटल बिहारी वाजपेयी

On the auspicious occasion of the birthday of our past Prime Minister Atal Ji, I am posting excerpt from an inspiring poem written by him. सिंधु में ज्वार: अटल बिहारी वाजपेयी आज सिंधु में ज्वार उठा है नगपति फिर ललकार उठा है कुरुक्षेत्र के कण–कण से फिर पांचजन्य हुँकार उठा है। शत–शत आघातों को सहकर जीवित हिंदुस्थान हमारा जग के …

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एक बरस बीत गया: अटल जी की नए साल पर कविता

एक बरस बीत गया - अटल बिहारी वाजपेयी

Another lovely poem by Atal Ji. One more year has passed by and one can just observe and feel inside the emptiness of this uninterrupted yet repetitive stream of passage of time… एक बरस बीत गया: अटल बिहारी वाजपेयी झुलसाता जेठ मास शरद चांदनी उदास सिसकी भरते सावन का अन्तर्घट रीत गया एक बरस बीत गया। सींकचों में सिमटा जग …

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