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Munshi Premchand Classic Hindi Story दो बैलों की कथा

दो बैलों की कथा: मुंशी प्रेमचंद की लोकप्रिय कहानी

दो बैलों की कथा [4]: हीरा और मोती

मोती ने मूक-भाषा में कहा – “बुरे फंसे, जान बचेगी? कोई उपाय सोचो”।

हीरा ने चिंतित स्वर में कहा – “अपने घमंड में फूला हुआ है, आरजू-विनती न सुनेगा”।

“भाग क्यों न चलें”?

“भागना कायरता है”।

“तो फिर यहीं मरो। बंदा तो नौ दो ग्यारह होता है”।

“और जो दौड़ाए”?

“तो फिर कोई उपाए सोचो जल्द”!

“उपाय यह है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें। मैं आगे से रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो, दोहरी मार पड़ेगी तो भाग खड़ा होगा। मेरी ओर झपटे, तुम बगल से उसके पेट में सींग घुसेड़ देना। जान जोखिम है, पर दूसरा उपाय नहीं है”।

दोनों मित्र जान हथेली पर लेकर लपके। सांड़ को भी संगठित शत्रुओं से लड़ने का तजुरबा न था।

वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था। ज्यों-ही हीरा पर झपटा, मोती ने पीछे से दौड़ाया। सांड़ उसकी तरफ मुड़ा तो हीरा ने रगेदा। सांड़ चाहता था, कि एक-एक करके दोनों को गिरा ले, पर ये दोनों भी उस्ताद थे। उसे वह अवसर न देते थे। एक बार सांड़ झल्लाकर हीरा का अन्त कर देने के लिए चला कि मोती ने बगल से आकर उसके पेट में सींग भोंक दिया। सांड़ क्रोध में आकर पीछे फिरा तो हीरा ने दूसरे पहलू में सींगे चुभा दिया।

आखिर बेचारा जख्मी होकर भागा और दोनों मित्रों ने दूर तक उसका पीछा किया। यहां तक कि सांड़ बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया। दोनों मित्र जीत के नशे में झूमते चले जाते थे।

मोती ने सांकेतिक भाषा में कहा – “मेरा जी चाहता था कि बचा को मार ही डालूं”।

हीरा ने तिरस्कार किया – “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए”।

“यह सब ढोंग है, बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे”।

“अब घर कैसे पहुंचोगे वह सोचो”।

“पहले कुछ खा लें, तो सोचें”।

सामने मटर का खेत था ही, मोती उसमें घुस गया। हीरा मना करता रहा, पर उसने एक न सुनी। अभी दो ही चार ग्रास खाये थे कि आदमी लाठियां लिए दौड़ पड़े और दोनों मित्र को घेर लिया, हीरा तो मेड़ पर था निकल गया। मोती सींचे हुए खेत में था। उसके खुर कीचड़ में धंसने लगे। न भाग सका। पकड़ लिया। हीरा ने देखा, संगी संकट में है तो लौट पड़ा। फंसेंगे तो दोनों फंसेंगे। रखवालों ने उसे भी पकड़ लिया।

प्रातःकाल दोनों मित्र कांजी हौस में बंद कर दिए गए।

दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पड़ा था कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ में न आता था, यह कैसा स्वामी है। इससे तो गया फिर भी अच्छा था। यहां कई भैंसे थीं, कई बकरियां, कई घोड़े, कई गधे, पर किसी के सामने चारा न था, सब जमीन पर मुर्दों की तरह पड़े थे।

कई तो इतने कमजोर हो गये थे कि खड़े भी न हो सकते थे। सारा दिन मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए रहते, पर कोई चारा न लेकर आता दिखाई दिया। तब दोनों ने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू की, पर इससे क्या तृप्ति होती।

रात को भी जब कुछ भोजन न मिला तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला दहक उठी। मोती से बोला – “अब नहीं रहा जाता मोती”!

मोती ने सिर लटकाए हुए जवाब दिया – “मुझे तो मालूम होता है कि प्राण निकल रहे हैं”।

“आओ दीवार तोड़ डालें”।

“मुझसे तो अब कुछ नहीं होगा”।

“‘बस इसी बूत पर अकड़ते थे”।

“सारी अकड़ निकल गई”।

बाड़े की दीवार कच्ची थी। हीरा मजबूत तो था ही, अपने नुकीले सींग दीवार में गड़ा दिए और जोर मारा तो मिट्टी का एक चिप्पड़ निकल आया। फिर तो उसका साहस बढ़ा उसने दौड़-दौड़कर दीवार पर चोटें कीं और हर चोट में थोड़ी-थोड़ी मिट्टी गिराने लगा।

उसी समय कांजी हौस का चौकीदार लालटेन लेकर जानवरों की हाजिरी लेने आ निकला। हीरा का उद्दंड्डपन्न देखकर उसे कई डंडे रसीद किए और मोटी-सी रस्सी से बांध दिया.

मोती ने पड़े-पड़े कहा – “आखिर मार खाई, क्या मिला”?

“अपने बूते-भर जोर तो मार दिया”।

“ऐसा जोर मारना किस काम का कि और बंधन में पड़ गए”।

“जोर तो मारता ही जाऊंगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएं”।

“जान से हाथ धोना पड़ेगा”।

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