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Munshi Premchand Classic Hindi Story दो बैलों की कथा

दो बैलों की कथा: मुंशी प्रेमचंद की लोकप्रिय कहानी

दो बैलों की कथा [2]: हीरा और मोती

एक बालक ने कहा – “ऐसे बैल किसी के पास न होंगे”।

दूसरे ने समर्थन किया – “इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए”।

तीसरा बोला – “बैल नहीं हैं वे, उस जन्म के आदमी हैं”।

इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस नहीं हुआ। झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा तो जल उठी। बोली – “कैसे नमक-हराम बैल हैं कि एक दिन वहां काम न किया, भाग खड़े हुए”।

झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका – “नमक हराम क्यों हैं? चारा-दाना न दिया होगा तो क्या करते”?

स्त्री ने रोब के साथ कहा – “बस, तुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते हो, और तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते हैं”।

झूरी ने चिढ़ाया – “चारा मिलता तो क्यों भागते”?

स्त्री चिढ़ गयी – “भागे इसलिए कि वे लोग तुम जैसे बुद्धुओं की तरह बैल को सहलाते नहीं, खिलाते हैं तो रगड़कर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोर, भाग निकले। अब देखूं कहां से खली और चोकर मिलता है। सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूंगी, खाएं चाहें मरें”।

वही हुआ। मजूर की बड़ी ताकीद की गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए।

बैलों ने नांद में मुंह डाला तो फीका-फीका, न कोई चिकनाहट, न कोई रस!

क्या खाएं? आशा-भरी आंखों से द्वार की ओर ताकने लगे। झूरी ने मजूर से कहा – “थोड़ी-सी खली क्यों नहीं डाल देता बे”?

“मालकिन मुझे मार ही डालेंगी”।

“चुराकर डाल आ”।

“ना दादा, पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे”।

दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला। अबकी उसने दोनों को गाड़ी में जोता।

दो-चार बार मोती ने गाड़ी को खाई में गिराना चाहा, पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।

संध्या-समय घर पहुंचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बांधा और कल की शरारत का मजा चखाया फिर वही सूखा भूसा डाल दिया। अपने दोनों बालों को खली चूनी सब कुछ दी।

दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। झूरी ने इन्हें फूल की छड़ी से भी छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे। यहां मार पड़ी। आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा!

नांद की तरफ आंखें तक न उठाईं।

दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पांव न उठाने की कसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गया, पर दोनों ने पांव न उठाया। एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाये तो मोती को गुस्सा काबू से बाहर हो गया। हल लेकर भागा। हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाटकर बराबर हो गया। गले में बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होतीं तो दोनों पकड़ाई में न आते.

हीरा ने मूक-भाषा में कहा – “भागना व्यर्थ है”।

मोती ने उत्तर दिया – “तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी”।

“अबकी बड़ी मार पड़ेगी”।

“पड़ने दो, बैल का जन्म लिया है तो मार से कहां तक बचेंगे”?

गया दो आदमियों के साथ दौड़ा आ रहा है, दोनों के हाथों में लाठियां हैं”।

मोती बोला – “कहो तो दिखा दूं मजा मैं भी, लाठी लेकर आ रहा है”।

हीरा ने समझाया – “नहीं भाई! खड़े हो जाओ”।

“मुझे मारेगा तो मैं एक-दो को गिरा दूंगा”।

“नहीं हमारी जाति का यह धर्म नहीं है”।

मोती दिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुंचा और दोनों को पकड़ कर ले चला। कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न की, नहीं तो मोती पलट पड़ता। उसके तेवर देख गया और उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही भलमनसाहत है।

आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया, दोनों चुपचाप खड़े रहे।

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