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शिबू ने लालटेन जलाई - सबने दिवाली मनाई: मंजरी शुक्ला

शिबू ने लालटेन जलाई – सबने दिवाली मनाई: मंजरी शुक्ला

बहुत समय पहले की बात है… एक गाँव था शिवपुर। उसी गाँव में एक चरवाहा रहता था, बहुत ही सीधा और भोला-भाला बिना किसी लालच और बिना किसी स्वार्थ के सबके दुःख सुख में एक पैर से खड़ा रहता था। गाँव वाले भी उसकी निश्चलता के कारण उसे बहुत प्यार करते थे। शिबू बड़ी ही मेहनत से गाँव वालों की बकरियाँ चराता था और बदले में वे उसे जो भी पैसे खाने-पीने के लिए सामान देते थे,वो बिना किसी ना नुकुर के रख
लेता था।

एक बार शिबू जब बकरियाँ चराकर लौट रहा था तो उसने देखा कि बरसात के कारण सड़क की एक ओर की मिट्टी बहती जा रही थी और उसी तरफ एक गड्ढा था। ये देखकर शिबू परेशान हो गया क्योंकि वही एकमात्र सड़क थी, जो शहर से गाँव को जोड़ती थी और इसलिए बिना उस सड़क पर आए गाँव आना असंभव था।

शिबू उस दिन जल्दी ही बकरियाँ चराकर गाँव पहुँचा और मुखिया जी से बोला – “मुखिया जी… गाँव की ओर आने वाली सड़क की मिट्टी लगातार बारिश की वजह से बहती ही जा रही है, अगर कोई उस सड़क से लगे हुए गड्ढे में गिर गया तो उसे बहुत चोट आ जाएगी।”

मुखिया जी के साथ जितने लोग भी आराम से पीपल के पेड़ की छाँव में बैठे ठंडी-ठंडी हवा का आनंद ले रहे थे, जोरो से हँस पड़े।

शिबू उन्हें हक्का-बक्का होकर देख रहा था।

मुखिया जी मुस्कुराते हुए बड़े ही प्यार से बोले – “उस तरफ कोई बच्चा अकेले जाता ही नहीं है और हम लोगो को तुमने बता ही दिया है तो हम सब अब बहुत सावधानी से आया जाया करेंगे”।

“पर मुखिया जी… जो रात-बिरात बाहर से आएगा वो जल्दी में भूल भी तो सकता है” शिबू धीरे से बोला।

“ऐसा कुछ नहीं होगा… तुम बेकार ही खुद भी परेशान हो रहे हो और हमें भी कर रहे हो”… मुखिया थोड़ा झल्लाते हुए बोले।

शिबू वहाँ से चला तो गया पर वो जानता था कि हर समय किसी को याद नहीं रह सकता है कि सड़क की मिट्टी धीरे-धीरे गिर रही है।

इसी तरह से दिन बीतने लगे और हलकी ठंड के साथ ही सबके प्रिय त्यौहार दिवाली की तारीख नज़दीक आने लगी।

रोज़ाना की तरह आज शाम को भी शिबू बकरियाँ चराने के बाद गाँव की तरफ लौट रहा था कि तभी एक बकरी का बच्चा भागते हुए बाकी सब बकरियों से आगे निकलने के चक्कर में टूटी सड़क के कारण फिसल कर गड्ढे में गिर पड़ा। शिबू ने तुरंत उसे बाहर निकाल कर गोद में उठा लिया और घर जाकर मरहम पट्टी कर दी, पर कुछ दिनों तक बेचारा वो नन्हा बच्चा लंगड़ा कर चलता रहा।

शिबू ने फ़िर से जाकर मुखिया जी को सब बात बताई और बोला – “आप मेरे लिए एक लालटेन और तेल की व्यवस्था आकर दे, तो मैं उसे सड़क के किनारे रख दूँगा और फ़िर कभी कोई भी उस गड्ढे में नहीं गिरेगा”।

इस बार मुखिया जी थोड़ा सा गुस्सा होते हुए बोले – “हम लोग बकरी का बच्चा नहीं है… हम सबको ध्यान रहेगा… अब भागो यहाँ से”।

शिबू बेचारा मुखियाँ जी की डाँट खाकर चुपचाप वहाँ से चला गया पर उसने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि जब तक सड़क की मरम्मत नहीं हो जाती वो सबको उस गड्ढ़े में गिरने से बचाएगा।

जब पूरा गाँव दिवाली की तैयारी में व्यस्त था तो शिबू ने अपने पटाखे और कपड़ों के लिए इकठ्ठा किये हुए पैसे उठाए और बाज़ार की तरफ चल दिया।
आखिर कई दुकाने देखने के बाद उसे एक सुनहरे रंग की लालटेन पसंद आई। उसने लालटेन के साथ एक महीने के हिसाब से तेल भी खरीद लिया और ख़ुशी ख़ुशी घर की ओर चल दिया।

रास्ते में उसी पीपल के पेड़ के नीचे मुखिया जी गाँव वालों के साथ बैठे ठहाके लगा रहे थे कि शिबू को अपने पास आता देख उसे आवाज़ लगाते हुए बोले – “तुमने दिवाली की कोई भी खरीदारी नहीं करी”।

शिबू सकुचाते हुए बोला – “सारे पैसे तो लालटेन और तेल खरीदने में ही खर्च हो गए।”

ये सुनकर सभी एक दूसरे का मुँह आश्चर्य से देखने लगे।

मुखिया जी के बगल में बैठे बूढ़े काका बोले – “अरे, दिवाली के बाद सड़क का काम होने तो लगेगा। तुम अभी से इतने परेशान क्यों हो रहे हो”?

मुखिया जी तेज आवाज़ में बोले – “साल भर दो जोड़ी कपड़े पहने घूमता रहता हैं और अपने पास के जोड़े हुए पैसे इसने रद्दी लालटेन लाने में खर्च कर दिए”।

मुखिया जी कुछ और बोलते इसके पहले ही शिबू आँखों से छलकते आँसुओं को पोंछते हुए वहाँ से चल दिया।

रोज शाम को शिबू जंगल से बकरियाँ चराकर लौटते समय किनारे पर लालटेन रख देता।

कई बार रात के समय लोग उस लालटेन की रोशनी से उस गड्ढ़े में गिरने से बचे। वे सभी मन ही मन शिबू को दुआएँ देते पर मुखिया जी से लड़ाई मोल लेने के डर से चुप ही रहते।

छोटी दिवाली के दिन जहाँ पूरा गाँव दीयों की रौशनी में जगमग कर रहा था, वहीँ शिबू अपने अँधेरे घर में चुपचाप अकेला बैठा हुआ था। तभी उसे याद आया कि लालटेन में रात भर के लिए पर्याप्त तेल नहीं था। उसने डिब्बे में देखा तो तेल खत्म हो चुका था। उसे कुछ भी समझ नहीं आया और वो चुपचाप बैठ गया।

उधर दूसरी तऱफ शहर से खरीदारी कर लौट रहे, मुखिया जी उसी सड़क से वापस आ रहे थे। घर पहुँचने की जल्दी और सन्नाटे में झनझनाती झींगुर की आवाज़ से उनके मन में दहशत हो रही थी। वो लगभग भागते हुए अपने घर की तरफ तेजी से बढे जा रहे थे। हड़बड़ी और जल्दबाज़ी में वे भूल ही गए कि सड़क टूटी हुई है।

अचानक उनका पैर फिसला और पल भर में ही वो उसी गड्ढ़े में थे। मुखिया जी की डर के मारे चीख निकल गई। कपड़ों की थैली के ऊपर गिरने से उन्हें ज्यादा चोट तो नहीं आई, पर उनके हाथ रगड़ खाने की वजह से बुरी तरह से छिल गए थे। उन्होंने गड्ढ़े के ऊपर देखने की कोशिश की, पर अमावस्या के कारण चारों ओर घुप अँधेरा था।

रात में तो अब कोई इस रास्ते से आएगा भी नहीं… सोचते हुए डर के मारे उनकी टाँगें काँपने लगी। अब उन्हें बार बार शिबू का कहा हुआ हर वाक्य याद आ रहा था। उस के साथ किया हुआ उनका व्यवहार उन्हें और लज्जित कर रहा था। जब उनके कुछ भी समझ में नहीं आया तो वे जोर-जोर से रोने लगे।

तभी उनके गड्ढ़े में कुछ रौशनी सी आई।

“कौन कौन…?” मुखिया जी ने डरते हुए धीरे से पूछा।

“मैं हूँ शिबू… मुखिया जी” कहते हुए शिबू ने सड़क पर लेटते हुए अपना हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया। बड़ी मुश्किलों के बाद आखिरकार मुखिया जी किसी तरह बाहर निकल पाए।

“मेरा शिबू… कहते हुए मुखिया जी शिबू से लिपटकर हिचकियाँ लेते हुए रोने लगे” शिबू की भी आँखें भर आई।

रास्ते में शिबू ने बताया कि आज मिट्टी का तेल खत्म होने के कारण वो खाना बनाने वाला तेल लालटेन में डालने आ गया था।

मुखिया जी कुछ कहना चाहते थे, पर उनका गला भर आया। वे चुपचाप गर्दन नीची करके चलते रहे। दूसरे दिन मुखिया जी और गांववालों ने मिलकर शिबू के पूरे घर को दीयों से सजा दिया। जगमगाते दीयों से रोशन उस घर के सामने खड़े होकर वे सभी लोग शिबू के साथ पटाखे फोड़ते हुए खूब मस्ती कर रहे रहे थे… और सुन्दर नए कपड़ों में मिठाई खाता हुआ शिबू किसी राजकुमार सा प्रतीत हो रहा था।

मंजरी शुक्ला [नन्हें सम्राट में भी प्रकाशित]

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