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राजा बन गया बंदर

राजा बन गया बंदर: घमंड में चूर राजा की प्रेरक कहानी

चंद्रपुर देश का राजा चाँदी सिंह दूर-दूर तक अपने सनकीपन के कारण मशहूर था। वह जब भी किसी बात को करने का ठान लेता तो पीछे ना हटता। कई बार तो उसकी मूर्खतापूर्ण बातों पर उसके मंत्री अपने सर पर हाथ रखकर बैठ जाते पर वे उससे कुछ ना कह पाते, क्योंकि चाँदी सिंह से कुछ भी कहने का अर्थ था अपने आपको काल कोठरी में देखना… इसलिए पूरा राज्य चाँदी सिंह की मूर्खता और भगवान के भरोसे चल रहा था। एक बार चांदी सिंह अपने राज्य की सैर करने निकला। तभी उसने एक जादूगर को हवा में कुछ गेंदें उछालते हुआ अपना जादू का खेल दिखाते देखा। बस चांदी सिंह को तो समय बिताने का बहाना मिल गया वो तुरंत उसके पास जा पहुंचा और बोला – “तुम इन भोले-भाले मासूम बच्चों को क्यों बहका रहे हो?”

राजा का गुस्सा देखकर, हँसते मुस्कुराते बच्चे डर के मारे अपने घरों की तरफ दौड़ पड़े।

जादूगर तो बेचारा डर के मारे थर-थर कांपने लगा और बोला – “महाराज, मैं तो बस बच्चों का मनोरंजन कर रहा था। इसी खेल से मेरी रोजी रोटी चलती हैं।”

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“नहीं नहीं… तुम बच्चों को ये उलटे सीधे खेल दिखाकर गुमराह कर रहे थे। तुम्हें इसका दंड अवश्य मिलेगा…” और यह कहते हुए उसने अपने साथ खड़े सिपाहियों से कहा – “गिरफ्तार कर लो इसे…”

वहाँ खड़े सभी लोगो को राजा पर बहुत गुस्सा आया पर वे कर भी क्या करते थे इसलिए सब चुपचाप खड़े थे सिफ जादूगर चीख-चीख कर राजा से रहम की भीख मांग रहा था पर राजा तो मुड़ कर ऐसे चला गया था जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

जब राजा वहाँ से थोड़ा आगे बढ़ा तो उसने देखा कि बरगद के पेड़ के नीचे काला चोगा पहने हुए एक बूढा बैठा हुआ था जिसके सफ़ेद बाल और सफ़ेद दाढ़ी कमर तक हवा के कारण लहरा रही थी। वो राजा की तरफ अजीब सी नज़रों से घूर रहा था। राजा को ये देखकर बहुत गुस्सा आया उसने उसे इशारे से अपने पास बुलाया पर बूढ़े ने उसे देखकर मुंह फेर लिया। ये देखकर राजा सहित उसके सिपाही भी हक्के बक्के रहे गए। राजा ने अपने सिपाही की ओर कनखियों से देखा ओर उसका सिपाही राजा का इशारा तुरंत समझ गया। वह दौड़ते हुए उस बूढ़े के पास गया और उसे खींचकर राजा के सामने लाकर खड़ा कर दिया। राजा गुस्से से काँप रहा था। उसका मुँह लाल हो गया वह चिल्लाकर बोला – “मेरा अपमान करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई”।

बूढा बोला – “तुमने उस जादूगर को बिना किसी कारण के कारावास में क्यों डाल दिया?”

राजा ने कहा – “ये मेरा राज्य हैं मैं इसे जैसे चाहूँगा वैसे चलाऊंगा। तुम कोई नहीं होते हो पूछने वाले।”

बूढा बोला – “क्यों क्या तुम्हें जादू पर विश्वास नहीं हैं?”

राजा ने कहा – “नहीं, मैं ये सब नहीं मानता”।

बूढा बोला – “इस राज्य में बहुत सारे जादूगर हैं, क्या सबको कारावास में भिजवा दोगे?”

राजा बोला – “हाँ! सबको सलाखों के पीछे भेज दूंगा।”

राजा का जवाब सुनकर बूढ़ा वहाँ से गायब हो गया ।

राजा अपने महल में जाने के बाद सारा समय उस बूढ़े के बारे में ही सोचता रहा।

वह उस बूढ़े के बारे में जितना सोचता उसका क्रोध उतना ही बढ़ता चला जाता था।

रात में उसने एक अजीब सा फैसला लिया और बैचेनी से सारी रात कमरे में चलकदमी करते हुए सुबह का इंतज़ार करने में बिताई।

दूसरे दिन सुबह जैसे ही दरबार लगा उसने महामंत्री को बुलवाया और कहा – “राज्य भर में जितने भी जादूगर हैं सबको पकड़ कर लाओ और कारावास में डाल दो”।

उसकी ये बात सुनते ही राज दरबार में सन्नाटा छा गया ओर सबको जैसे काठ मार गया। महामंत्री की ज़ुबान भी लड़खड़ा गई पर उसने धीरे से पूछा – “पर महाराज, उन सबका कुसूर क्या हैं?”

उनका कसूर हैं कि वे सब जादूगर है।

महामंत्री को राजा की आज्ञा का पालन करना पड़ा। उसके सैनिक जगह-जगह ढूँढ कर जादूगरों को पकड़ कर बंदी बनाने लगे। किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, पर राजा की सनक थी जो उसके सर पर चढ़कर बोल रही थी। एक बार जब राजा के सिपाही एक जादूगर को जबरदस्ती पकड़ कर ला रहे थे और उस का बच्चा जादूगर के पैरों में लिपटा हुआ था और उसे नहीं जाने दे रहा था। ये देखकर उस सिपाही ने बच्चे को जोर से धक्का दिया जिससे वह बच्चा दूर जाकर गिरा तभी वहाँ पर वो बूढा ना जाने कहाँ से अचानक आ गया और बोला – “अब तुम्हारा राजा सिर्फ सनकी ही नहीं रह गया बल्कि वो सत्ता के नशे में चूर होकर अहंकारी और निरंकुश हो गया हैं। अब उसे सबक सिखाना ही पड़ेगा।”

सिपाही उसे कुछ बोलता इससे पहले ही वो बूढा वहाँ से जा चुका था।

कुछ ही पलों बाद वो बूढ़ा राजा के दरबार में खड़ा था।

राजा ने क्रोधित होते हुए पुछा – “तुम अंदर कैसे आ गए?”

बूढा उसकी तरफ देखते हुए गुस्से से बोला – “तुमने पूरे राज्य में त्राही-त्राही मचा रखी हैं। बेकसूर लोगो को कारावास में डाल रहे हो। क्या तुम्हें एक पल के लिए भी उनके परिवार वालों पर दया नहीं आई?”

राजा ने चीखते हुए जवाब दिया – “ऐसे बेकार की बातें करके तुम मेरा समय मत खराब करो”।

बूढ़े ने कहा – “इस पूरे दरबार में एक भी आदमी का नाम बता दो जो तुम्हारे इस निर्णय के पक्ष में हो”।

राजा ने गुस्से से सबकी तरफ देखा तो सभी ने अपने चेहरे झुका लिए।

राजा चिल्लाया – “तुम सब लोग मेरे नौकर हो और इस बूढ़े का पक्ष ले रहे हो”।

पर किसी ने सर नहीं उठाया क्योंकि सभी राजा से बहुत त्रस्त और परेशान हो चुके थे।

तभी राजा बोला – “देखना, मैं तुम्हारा क्या हाल करता हूँ। तुम्हें अब सारा दिन में पेड़ से बंधवाकर रखूँगा तो तुम्हारी सारी अक्ल ठिकाने आ जाएगी”।

“बहुत पसंद हैं ना पेड़ तुम्हें, अब उन्हीं पर रहना कल से…” वो बूढा गुस्से से बोला और वहाँ से गायब हो गया ।

राजा बोला – “अब जितने भी जादूगर कैद हैं, मैं उन सबसे कल मिलूंगा…” और यह कहते हुए राजा दरबार से चला गया ।

दूसरे दिन दरबार में सभी बैचेनी से राजा की प्रतीक्षा कर रहे थे पर उसका कहीं अता पता ही नहीं था।

महामंत्री बोला – “ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि महाराज समय पर दरबार ना आए हो?”

एक दरबारी ने कहा – “मुझे तो बहुत चिंता हो रही हैं। हमें चलकर देखना चाहिए कि कहीं महाराज का स्वास्थ्य खराब ना हो?”

“हाँ, हम सब महल में चलकर देखते हैं” महामंत्री ने जवाब दिया।

सभी लोग जब महल में पहुंचे तो पता चला कि महाराज तो सुबह से अपने कक्ष से बाहर निकले ही नहीं। ये बात सुनकर सब बहुत घबरा गए और फिर महामंत्री ने जाकर राजा के कमरे के दरवाजे पर धीरे से धक्का दिया ।

दरवाजे के खुलते ही सभी लोग अंदर की तरफ दौड़े। पर वहाँ पहुँचकर देखा तो जैसे सब सन्न रह गए। राजा के बिस्तर पर एक बन्दर बैठा हुआ था और उसने वो सभी गहने पहने हुए थे जो राजा पहनता था। सब एक दूसरे कि तरफ देख रहे थे पर आश्चर्य और डर के मारे किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। तभी वो बन्दर अचानक खिड़की से बाहर कूद गया। महामंत्री सहित सभी दरबारी उसके पीछे पीछे दौड़े और बाग़ में पहुँच गए। पर तब तक बन्दर आम के पेड़ के ऊपर पहुँच चुका था और एक डाल से दूसरी डाल पर छलाँग लगा रहा था।

सभी अपने राजा को बन्दर बना देख कर बहुत दुखी थे। तभी अचानक वहाँ पर बूढ़ा आदमी प्रकट हुआ और बन्दर की तरफ देखते हुए बोला – “तुम्हारा राजा मुझे पेड़ से बंधवा रहा था ना, अब ये ज़िंदगी भर इन्हीं पेड़ों पर कूदता फाँदता रहेगा”।

महामंत्री हाथ जोड़कर विनती भरे स्वर में बोला – “इनके किए हुए कर्मों का दंड इन्हें मिल चुका हैं। अब आप इन्हें इनके असली रूप में ले आइये। मुझे विश्वास हैं कि इन्हें भी अब बहुत पश्चाताप हो रहा होगा”।

महामंत्री की बात सुनकर बूढ़े का दिल कुछ पसीजा और उसने बन्दर की तरफ देखते हुए कुछ मन्त्र बोले।

अचानक वहाँ पर धुंआँ सा उठा और बन्दर की जगह उनका राजा खड़ा हुआ था।

राजा बूढ़े के पैरों में गिर गया और रूंधे गले से बोला – “मैंने अपनी प्रजा पर बहुत अत्याचार किये हैं पर मैं अब सबके चेहरों पर हमेशा मुस्कान और ख़ुशी लाऊँगा”।

बूढा यह सुनकर मुस्कुरा दिया और वहाँ से गायब हो गया।

राजा ने तुरंत महामंत्री से कहकर सभी जादूगरों को उसी समय मुक्त करवा दिया और सबको धन एवं उपहार देकर विदा किया। उसके बाद प्रजा के सुख दुःख में भागीदार रहकर उसने बहुत वर्षो तक सुखपूर्वक राज्य किया ।

मंजरी शुक्ला

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