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होली के त्योहार से जुड़ी कुछ बाल-कहानियाँ

होली वाला बर्थडे: मंजरी शुक्ला

चुनमुन एक बहुत ही प्यारी और सुन्दर सी लड़की थी जिसके गोरे-गोरे गाल हमेशा कश्मीरी सेब की तरह लाल रहते थे और जब वह अपनी नीली आँखों को गोल गोल नचाकर देखती तो सभी के चेहरों पर मुस्कान तैर जाती थी।

आज तो चुनमुन बहुत ही खूबसूरत लग रही थी क्योंकि आज उसका “स्पेशल डे” जो था यानी उसका “होली वाला बर्थडे”… जबसे उसकी मम्मी ने उसे बताया था कि उसका फर्स्ट बर्थडे होली के दिन पड़ा था तब से उसने हर साल अपना बर्थडे होली के दिन ही मनाने का सोच लिया था।

ऐसा नहीं था कि उसे रंग खेलना बहुत पसंद था या फिर दूसरे बच्चों की तरह उसे दिन भर मोहल्ले में पिचकारी लेकर घूमने में मज़ा आता था बल्कि वह तो होली के दिन बनने वाले ढेर सारे पकवानों के पीछे पागल थी।

ख़ासतौर से दादी के हाथ की गुझिया और बालूशाही। जब से उसे पता चला था कि आस पड़ोस वाले घरों में भी होली के नज़दीक आते ही स्वादिष्ट मिठाइयाँ और कई तरह की स्वादिष्ट चीज़े बनने लगती है तो उसने अपने दिमाग का घोड़ा बहुत तेज दौड़ाया। इतनी तेज़… इतनी तेज़, कि वहाँ तक किसी दूसरे का घोडा पहुँच ही पाया।

उसने घर में एलान कर दिया कि वह होली के दिन किसी से कोई भी उपहार नहीं लेगी क्योंकि वह एक बहुत ही सीधी सादी और भोली बच्ची है। उसे अगर कोई कुछ देना ही चाहता है तो बस घर के बने हुए पकवान ले आया करे, ख़ासतौर से मीठे वाले स्वादिष्ट व्यंजन…

नन्ही सी चुनमुन की इस घोषणा के बाद से मोहल्लेवालों का प्यार उसके लिए कई गुना और बढ़ गया। वे सभी अपने बच्चों को चुनमुन का उदहारण देते हुए कहते, एक चुनमुन है कि कोई भी गिफ़्ट नहीं माँगती है और एक तुम लोग हो, जन्मदिन के दो महीने पहले से ही घर में उधम जोत कर रख देते हो, ये चाहिए, वो चाहिए… बेचारे बच्चे डाँट फटकार खाकर इधर उधर बढ़ लेते और उधर चुनमुन बर्थडे के बहाने इमरती, जलेबी और गुझिया पर जी भर कर हमला बोल रही होती थी।

आज अपने जन्मदिन पर सफ़ेद रंग की परियों जैसी पोशाक में तैयार होकर वह बिलकुल सचमुच की परी लग रही थी, लगती भी क्यों ना, आज उसका जन्मदिन यानी होली जो थी, जिसका साल भर वह बेसब्री से इंतज़ार करती रहती थी।

उसने अभी सभी दोस्तों और आस पड़ोस वाले ढेर सारे अंकल-आंटी से से उपहार में केवल घर की बनी हुई मिठाइयाँ ही लाने के लिए ही कहा था क्योंकि वह बर्थडे बीत जाने के बाद भी सारे समय इनके अलावा कुछ भी नहीं खाती थी।

मम्मी भी उसे हर वक़्त समझाती रहती थी कि ज़्यादा मीठा खाने से दाँतों में कीड़े लग जाते हैं जिससे दाँत खराब होकर गिर जाते हैं, पर इन सब बातों को चुनमुन एक कान से सुनकर दूसरे कान से तुरंत निकाल देती थी।

अगर कभी वह जलेबी या बालूशाही का नाम भी सुन लेती, तो उसके मुँह में पानी आ जाता था और वह उन पर टूट पड़ती थी। इसीलिए वह अपने जन्मदिन का साल भर रास्ता देखती रहती थी क्योंकि आज के दिन उसके मम्मी – पापा भी उसे बिल्कुल नहीं डांटते थे और वह जी भर कर जो चाहे वो खा सकती थी।

आज सारा दिन घर में जी भर के उछल -कूद करने के बाद भी उसका दिन बड़ी बैचैनी में बीता पर जैसे ही शाम होने लगी और उसके दोस्तों और बहुत सारे अंकल – आंटियों ने आना शुरू किया तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। सभी के हाथों में रंगबिरंगे बड़े-बड़े डिब्बे देखकर तो वह जैसे किसी कल्पनालोक में ही चली गई थी, पर जब उसके हाथों में सबने उसे उपहार देने शुरू किये तब कहीं जाकर उसे विश्वास हुआ कि वह कोई सपना नहीं देख रही है।

उसने बड़ी ख़ुशी – ख़ुशी केक काटा और अपने दोस्तों के साथ मिलकर खूब उछल- कूद मचाई। उन सभी ने जी भर के पार्टी में मज़ा किया, केक खाया, रंग – बिरंगे गुब्बारे फोड़े और मनपसंद गानों पर मस्ती में नाचे। आखिर में जब सबने खूब बढ़िया खाना खा लिया तो चुनमुन को फिर से जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामाएं देते हुए विदा हुए।

जैसे ही सारे लोग चले गए चुनमुन ने फटाफट अपने गिफ़्ट खोलने शुरू किये और तरह – तरह के लज़ीज़ व्यंजन देककर वह उन पर टूट पड़ी। उसकी मम्मी ने उसे बहुत समझाया कि वह पहले डिनर कर ले उसके बाद थोड़ा सा केक खा ले पर चुनमुन ने भला आज तक क्या मम्मी की बात मानी थी जो आज मानती।

उसने ढेर सारी गुझिया खाई और उसके बाद आराम से बाकी के डिब्बे अपने बिस्तर के आसपास रखकर सो गई। सपने में भी रात भर वह जलेबी की दुकानें, शकरपारे के खिलौने और केक के महल देखती रही।

सुबह जब वह उठी तो सबसे पहले उसने ब्रश करने के तुरंत बाद इमरती खाई और टिफिन में भी ज़िद करके ढेर सारी गुझिया ही ले गई।

इस तरह आजकल चुनमुन के दिन और रात तरह-तरह के मीठे पकवान खाकर ही बीतने लगे।

एक दिन स्कूल की तरफ़ से पिकनिक जाने का प्रोग्राम बना और उसमें कई तरह के गेम्स और नाच-गाने करने वाले बच्चों के ग्रुप बने। प्रिंसिपल सर की तरफ़ से जीतने वाली टीम के लिए एक स्पेशल प्राईज़ की भी घोषणा की गई।

चुनमुन भी और बच्चों की तरह बहुत खुश थी। जब इंटरवल में सारे बच्चे ग्राउंड में इकठ्ठा हुए तो सभी किसी न किसी टीम का हिस्सा बन रहे थे। कईयों को तो टीचर्स खुद बुलाकर टीम में भर्ती करवा रहे थे।

चुनमुन एक टीचर से दूसरे टीचर के पीछे दौड़ रही थी पर उसे कोई भी अपनी टीम में नहीं लेना चाह रहा था। चुनमुन की आँखों से अपना ये अपमान देखकर आँसू बह निकले और फिर वह सब बच्चों से उसे अपनी टीम में लेने के लिए गिड़गिड़ाने लगी पर बच्चे उसे देखकर दूर-दूर भागने लगे।

चुनमुन को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि सब उसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं।

वह फूट-फूट कर रोने लगी और एक कोने में जाकर बैठ गई।

यह देखकर उसकी सहेली पीहू उसके पास आकर बोली – “तुम्हें पता है न कि जब हम पिकनिक पर जायेंगे तो वहाँ पर बहुत तरह के गेम्स होंगे?”

यह सुनकर चुनमुन ने आँसूं पोंछते हुए कहा – “हाँ”।

“इसीलिए कोई नहीं चाहता कि तुम उनकी टीम में रहो। तुमने अपने आपको कभी शीशे में देखा है। तुम फुटबॉल की तरह दिन ब दिन गोल होती ही चली रही हो और ज़रा सा चलने पर ही हाँफने लगती हो। तुम जिस भी टीम में जाओगी उसे हरा दोगी इसलिए सब बच्चे तुमसे दूर भाग रहे हैं। ”

ये सुनकर चुनमुन कुछ कहती, इससे पहले ही पीहू बोली – “तुम कभी भी रोटी-सब्ज़ी नहीं खाती हो और पता नहीं कितनी सारी उल्टी-पुल्टी चीजें खाती रहती हो इसलिए हमारी मम्मी भी नहीं चाहती कि हम तुमसे दोस्ती रखें”। यह कहकर पीहू जैसे ही उठने को हुई, चुनमुन ने कसकर उसका हाथ पकड़ लिया और ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए बोली – “मुझसे सच में बहुत बड़ी गलती हुई है कि मैंने अपनी मम्मी का कहना नहीं मानते हुए हरी सब्ज़ियाँ और पौष्टिक खाना छोड़ कर इतना मीठा खाया जिससे मैं इतनी मोटी और बेडौल हो गई।पर अब तक मैं यह बात समझ नहीं पाई थी कि इन सब चीजों के लालच में इतनी कमज़ोर हो गई हूँ कि अब अपना स्कूल बैग भी मुझसे ठीक से उठाया नहीं जाता है। पर अब मैं तुमसे प्रॉमिस करती हूँ कि आइन्दा ऐसा कभी नहीं होगा”।

“नहीं-नहीं… अब मैं कुछ नहीं कर सकती हूँ”। कहते हुए पीहू खड़ी हो गई और चुनमुन से अपना हाथ छुड़ाने लगी।

“मत जाओ… मुझे छोड़कर मत जाओ” कहते हुए चुनमुन ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगी।

तभी उसकी नींद टूट गई। उसने आँखें खोलने पर देखा कि उसकी मम्मी प्यार से उसका सिर सहलाते हुए पूछ रही हैं – “कोई डरावना सपना देखा था क्या? उठो जल्दी से तैयार हो जाओ। तुम्हारे स्कूल जाने का टाईम हो गया है”।

चुनमुन ने इधर – उधर देखा और समझ गई कि उसने ये सब सपने में देखा था।

वह जल्दी से तैयार होकर जब नाश्ते की टेबल पर पहुँची तो हमेशा की तरह उसका मनपसंद बड़ा सा गुझियों से भरा हुआ डिब्बा रखा हुआ था और उसकी मम्मी उदास सी वही बैठी हुई थी।

उसने डिब्बा हटाते हुए कहा – “मुझे माफ़ कर दो मम्मी, मैं आज से हमेशा आपका कहना मानूँगी और अब आप मुझे नाश्ते में जल्दी से दूध और फ्रूट्स दो”।

यह सुनकर मम्मी उसे आश्चर्य से देखने लगी और उन्होंने चुनमुन को प्यार से गले लगा लिया।

इसके बाद चुनमुन ने अपने किसी भी जन्मदिन पर, किसी से कभी होली पर बनने वाले ढेर सारे मीठे और स्वादिष्ट पकवान लाने के लिए नहीं कहा। हाँ यह बात और है कि होली के दिन चुनमुन का बर्थडे मनाने वाला लॉजिक सबकी समझ में आ गया था और सबके चेहरों पर ढेर सारे रंगों वाली, रंगबिरंगी मुस्कान छा गई थी।…

डॉ. मंजरी शुक्ला

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