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और रंग मुस्कुरा दिए: मंजरी शुक्ला

और रंग मुस्कुरा दिए: मंजरी शुक्ला

होली का त्यौहार आने वाला था। सारे घर में खुशी की लहर दौड़ रही थी। पापा मिठाइयों की लिस्ट बनाने में व्यस्त थे तो मम्मी नए कपड़े और पूजा का सामान लिख रही थी। मैं अपने दोस्तों के साथ ढेर सारे रंग और पिचकारियों के बारे में बात करता रहता था। सभी चिंता में थे कि कौन सी वाली पिचकारी लेनी है या कौन से रंग बाज़ार में नए तरह के आये है।

वैसे इस बार हम सभी दोस्तों ने तय किया था कि हम सब प्राकृतिक रंगों से ही होली खेलेंगे वरना पिछली बार की तरह इस बार भी, किसी की आँखों में सूजन आ जाएगी या किसी के चेहरे में कई दिन तक जलन होती रहेगी।

दिवाली पर हम सभी मेरे नानाजी के गाँव गए थे तो मम्मी ने ऐलान कर दिया था कि पुताई तो होकर ही रहेगी चाहे होली पर क्यों ना हो। इसलिए हमारे घर में होली के साथ साथ दिन भर पेंट, चूना और कमरें की दीवारों पर भी बहस चलती रहती थी।

मैं जानता था कि जब भी मेरे स्कूल की छुट्टियाँ होती थी तभी मम्मी घर की सफ़ाई के प्लान बनाती थी ताकि मैं फ़ालतू इधर उधर ना घूम सकूँ। घर में किस कमरे में कौन से रंग का पेंट लगेगा, गुझिया बनेगी या शकरपारे… आजकल हमारे बीच यहीं बातें रह गई थी और हम सब कूद कूदकर अपनी राय दिया करते थे। कई बार तो यह सब बातें करते करते हमें पूरी रात भी कम पड़ जाती।

एक दिन, जब सब कमरों की पुताई की बात चल रही थी तो मैं दादा जी के कमरे के बाहर जाकर खड़ा हो गया।

दादा जी, हमेशा की तरह अपने कमरे के अंदर, भूरी सी पुरानी मेज के पास, प्लास्टिक के तारों की बुनी हुई कुर्सी पर बैठे हुए थे।

मैंने दादाजी के कमरे को शायद पहली बार ध्यान से देखा। जगह जगह से प्लास्टर उखड़ चुका था और छत के कोने में सीलन थी।

मैंने पूछा – “दादा जी, क्या आपके कमरे की पुताई नहीं हो रही है”?

उन्होंने धीरे से हँसकर कहा – “नहीं”।

“क्यों, हर साल सिर्फ़ आपका ही कमरा क्यों छोड़ दिया जाता है”? मैंने आश्चर्य से पूछा यह सुनकर दादाजी हँस दिए और बोले – “अच्छा है ना, कोई सामान अस्त व्यस्त नहीं होता है”।

“पर दादाजी, अगर आपके कमरे की पुताई हो जाएगी तो कमरा बिलकुल नया चमचमाता हुआ लगेगा। देखिए, इस पूरे घर में सिर्फ़ आप ही का कमरा ऐसा है जो नया और अच्छा नहीं लगता”। मैंने कमरे के उखड़े हुए प्लास्टर को देखते हुए कहा दादा जी ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा और वापस अपनी कुर्सी में पीठ टिकाते हुए आँखें मूँद ली।

पर मैंने हार नहीं मानी और जाकर माँ से कहा – “दादा जी के कमरे की पुताई क्यों नहीं हो रही है”?

पापा भी वहीं पर थे, माँ कुछ बोलती, उससे पहले ही पापा बोले – “अरे, वह नहीं करवाना चाहते है”?

“आपने अपने कमरे में तीन-तीन तरह के रंग पुतवा रखे है, लाल दीवार,पीली छत और उसके ऊपर नीले फूल… और दादा जी का कमरा कितना काला हो गया है ऐसा लगता है जैसे पता नहीं कितने सालों से कमरे में कोई रहता ही नहीं है”।

पापा मुझे गुस्से से घूरते हुए बोले – “तो क्या जबरदस्ती करवा दूँ? भागो यहाँ से”।

पापा की डाँट खा कर मैं चुपचाप वहाँ से चल दिया।

थोड़ी देर बाद मेरा दोस्त मुझे बुलाने आया और मैं उसके साथ फुटबॉल खेलने चला गया।

शाम को जब घर लौट कर आया, तब तक पुताई वाली बात मैं पूरी तरह से भूल चुका था।

मम्मी और पापा के बीच कपड़ों की बातें चल रही थी। मम्मी ने अपने लिए तीन-चार साड़ी, पापा के लिए कुरता पैजामा और मेरे लिए… मेरे लिए तो बहुत सारे कपड़ों की लिस्ट बना रखी थी।

जब वह दोनों बाज़ार जाने लगे तो मैंने मम्मी से कहा “दादा जी के कपड़े”।

मम्मी ने पापा की तरफ़ देखा तो पापा तुरंत बोले – “तुम्हारे दादा जी को कोई शौक नहीं है नए कपड़े पहनने का”।

“पापा यह कोई शौक नहीं होता है। होली के दिन सब लोग नए कपड़े पहनते है। क्या आपने दादाजी से पूछा”?

पापा अनमने से बोले – “ठीक है, जाकर तुम ही पूछ लो”।

मैं दौड़ते हुए दादाजी के पास गया और बोला – “दादा जी, हम लोग नए कपड़े खरीदने जा रहे हैं आपके लिए कुछ लाना है”?

“नहीं” कहते हुए दादाजी चुपचाप वापस अपनी किताब पढ़ने लगे।

मैं दुखी होते हुए वहाँ से चल दिया। बाज़ार की रौनक देखते ही बनती थी।

ढेर सारे नीले, लाल, हरे, पीले और भी ना जाने कितने सारे रंग देखकर ऐसा लग रहा था, मानों मैं किसी जादुई संसार में आ गया हूँ। हम लोग जब कपड़ों की दुकान में गए तो नए-नए तरह के कपड़े और साड़ी देखकर मम्मी-पापा तो बहुत खुश हो गए। उस दिन हमने खाना भी होटल में ही खाया था। हम लोग ढेर सारी शॉपिंग करके घर लौटे।

जब हम घर आए तब मम्मी को ध्यान आया कि वह तो जल्दी में दादाजी के लिए खाना बनाकर ही नहीं गई थी। पर उन्होंने यह बात इतने आराम से कही कि मुझे लगा जैसे वह मुझे कोई किस्सा सुना रही है”।

पापा ने कहा – “कोई बात नहीं वह दूध ब्रेड खा लेंगे”।

मैंने मम्मी से कहा – “पर दादा जी को तो ब्रेड बिलकुल पसंद नहीं है”।

“दूध गर्म करके दे आओ, ब्रेड के साथ” कहते हुए मम्मी ने मुझे घूरा और सोने चली गई।

मैंने दूध गर्म किया और दादाजी के कमरे में जाकर उनसे बोला – “दादाजी, दूध ब्रेड खा लीजिए”।

दादाजी ने पलट कर मुझे देखा। मैंने देखा उनकी आँखें गीली थी। वह हाथों में दादी की तस्वीर पकड़े बैठे थे।

“आप रो रहे हो”? मैंने दादी की तस्वीर देखते हुए पूछा।

“नहीं बेटा, दवा डाली थी” कहते हुए उन्होंने आँखें पोंछ ली।

पर मैं जानता था कि दादाजी रो रहे थे। मैं चुपचाप अपने कमरे में आ गया।

दूसरे दिन मैं अपने दोस्त राहुल के घर पहुँचा। वह उसके दादा जी के साथ बाहर बगीचे में ही बैठकर कहानी सुन रहा था। उसके मम्मी पापा भी वहीँ बैठे हँसी मजाक कर रहे थे।

उसके दादाजी जी बहुत सुन्दर सा गुलाबी रंग का नया कुरता पहने थे। कहानी खत्म होने पर जब हम उसके दादाजी के कमरे में पहुँचे तो उनका कमरा चमचमा रहा था।

मेरे दादाजी की तरह ना तो उनके कमरे की मेज और कुर्सियाँ पुरानी और गन्दी थी और ना ही कमरे का प्लास्टर उखड़ा हुआ था।

तभी राहुल की मम्मी दादाजी से बोली -“अब आप बताइए कि घर के लिए क्या-क्या सामान आएगा”?

मैं यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गया।

दादा जी बोले – “अरे बहू, तुम अपनी मर्ज़ी का कर लो”।

“नहीं, नहीं… आप नहीं बताएँगे तो कैसे आएगा सामान” कहते हुए राहुल के पापा ने बच्चों की तरह दादा जी का हाथ पकड़ लिया।

दादाजी ने प्यार से सबको देखा। उनके मुँह पर एक गर्व मिश्रित मुस्कान के साथ साथ आँखों में आँसूं थे। पर यह मेरे दादाजी वाले आँसूं नहीं थे।

मैंने राहुल से कहा – “मेरे दादाजी के कमरे की पुताई भी नहीं हुई और ना ही कभी वह अपने कपड़े लाने के लिए कहते है”।

राहुल बोला – “तेरे दादाजी को कोई कुछ लाकर नहीं देता होगा इसलिए उन्होंने कहना ही बंद कर दिया होगा”। और वह चुपचाप बैठकर मेरी तरफ़ देखने लगा।

मैं पूरे रास्ते सोचता रहा। मम्मी-पापा सच में दादाजी का बिल्कुल ध्यान नहीं रखते थे। मतलब मेरे मम्मी पापा इतने खराब है कि उन्होंने मेरे दादा जी के साथ ऐसा व्यवहार किया।

जब घर पहुँचा तो माँ बोली – “कल होली के दिन ही तेरा जन्मदिन भी है। क्या गिफ़्ट चाहिए तुझे”?

मैंने पापा और मम्मी को भरपूर नज़रों से देखते हुए कहा – “आप लोग दादाजी के कमरे में शिफ़्ट हो जाओ”। और यह कहते हुए मैं फूट फूट कर रो पड़ा।

पापा और मम्मी बहुत देर तक चुपचाप बैठे रहे। थोड़ी ही देर बाद दादाजी के कमरे की पुताई शुरू हो गई थी।

दादा जी के साथ मैं और पापा उनके लिए नए कपड़े लेने जा रहे थे। दादाजी और पापा के ठहाकों के बीच मुझे ढेर सारे खूबसूरत इंद्रधनुषी रंग चारों ओर मुस्कुराते नज़र आ रहे थे।

मंजरी शुक्ला

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