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होली स्पेशल: राजा की होली केक के संग

होली स्पेशल: राजा की होली केक के संग

मिट्टी की सोंधी महक के साथ ही ताजे केक की सुगंध हवेली के चारों ओर फ़ैल चुकी थी।

पुरानी सी हलके पीले रंग की हवेली, जो अब तक गुमनाम पड़ी हुई थी आजकल “केक वाली हवेली” के नाम से जानी जाती थी।

“केक वाली हवेली” का नाम गाँव वालों का ही दिया हुआ था क्योंकि उस हवेली को दूर से देखने पर ही मुँह में पानी आ जाता था। पर यह कोई जादुई हवेली नहीं थी, जहाँ पर केक अपने आप बन जाता था। यह कमाल था उस हवेली में रहने वाली एक बुढ़िया का… पर उस बुढ़िया का ना तो किसी को नाम पता था और ना ही वह खुद अपने बारें में किसी को कुछ बताती थी।

गाँव के बड़े बुजुर्ग बताते थे कि बरसों से “भूतिया हवेली” के नाम से कही जाने वाली उस हवेली के आसपास से शाम के समय कोई निकलने तक को तैयार नहीं होता था।

पर एक एक दिन जब अचानक ही वहाँ से बर्तनों की उठा पटक की आवाज़ें आने लगी तो लोग थोड़ा डरे पर जब बरसों से बंद पड़ी हुई खिड़कियाँ खुली और उनसे केक की खुशबू आने लगी तो लोग अपनी उत्सुकता नहीं रोक सके और डरते सहमते छोटे बच्चों की तरह एक दूसरे का हाथ पकड़ कर उस हवेली के अंदर दाख़िल हुए।

लम्बे सफ़ेद बालों वाली एक नाटे कद की बुढ़िया को देखकर सब आश्चर्यचकित रह गए। बुढ़िया उन्हें देखकर मुस्कुराई और उन्हें बड़े ही प्यार से अपने हाथों का बना केक खिलाया। केक खाते ही बच्चों से लेकर बूढ़े तक ख़ुशी से उछल पड़े। इतना स्वादिष्ट केक आज तक किसी ने नहीं खाया था। उन्होंने बुढ़िया का बहुत एहसान माना कि वह इस हवेली में रहने आ गई।

गाँव वालों ने एक दूसरे को इशारों में ही चुप रहने को कहा और उन्होंने उस हवेली के भूत के बारे में भी बुढ़िया को कुछ नहीं बताया कि कहीं डर के मारे बुढ़िया वह गाँव ही छोड़कर ना चली जाए।

पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। दिन बीतते गए और बुढ़िया बिना किसी भूत का ज़िक्र करे हुए आराम से हवेली में रहने लगी। जब भी हलकी बूँदा-बाँदी या बारिश होती तो वह केक बनाकर लोगो को बाँटती और उन के मुस्कुराते चेहरे देखकर बहुत खुश होती।

जब उसके केक की प्रसिद्धि दूर दराज़ तक फैलने लगी तो लोगो ने अपनी दुकानों के लिए भी बुढ़िया से केक बनवाने शुरू कर दिए।

बरसात के मौसम में तो बुढ़िया को साँस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती थी। बारिश में जहाँ बड़े बुजुर्ग गर्म कॉफ़ी या चाय के साथ स्वादिष्ट केक खाते वहीँ बच्चें गर्म दूध भी केक के नाम पर गटा गट पी जाते।

बुढ़िया का केक अब गाँव तक ही सिमित नहीं रह गया था बल्कि एक दूसरे के हाथ से आगे बढ़ता हुआ वह एक दिन राजमहल जा पहुँचा।

राजा ने जब महामंत्री के हाथ से, केक का एक टुकड़ा खाया तो वह बहुत देर तक गुमसुम सा बैठा रहा। सभी लोग राजा को ही देखे जा रहे थे कि एक पल भी चुप ना बैठने वाला राजा अचानक चुप क्यों हो गया था।

महामंत्री ने देखा कि सारा दरबार राजा को देखने के बाद उसे ही घूर रहा था।

महामंत्री का चेहरा डर से पीला पड़ गया।

उसे लगा कि राजा को केक पसंद नहीं आया है और इसीलिए राजा इतनी देर तक शाँत रहकर उसे कोई कठोर दंड देने के लिए सोच रहा है।

महामंत्री का मन हुआ कि वहाँ से उठकर भाग जाए पर उसके पैर भी डर के मारे काँप रहे थे।

तभी राजा उठा और सीधा दौड़ता हुआ महामंत्री के पास आ गया।

महामंत्री ने डर के आँखें कस कर मींच ली।

राजा ने उसे गले लगाते हुए कहा – “मैंने आज तक ऐसा स्वादिष्ट केक नहीं खाया। तुरँत मेरे लिए ऐसे दस केक और लेकर आओ। इस बार मै होली पर कोई मिठाई नहीं चखूँगा। रंग खेलने के बाद आराम से बैठकर सारा दिन सिर्फ़ केक ही खाऊंगा।

महामंत्री यह सुनकर बहुत खुश हो गया और अगले ही दिन अपने सैनिको के साथ बुढ़िया के गाँव के लिए निकल पड़ा।

बुढ़िया का गाँव और घर ढूँढने में महामंत्री को कोई दिक्कत नहीं हुई।

सभी लोग केक की तारीफ़ करते हुए बड़ी ख़ुशी ख़ुशी केक वाली बुढ़िया के बारे में तुरंत बता देते थे।

हवेली के पास आते आते महामंत्री और उसके सैनिकों की आँखों में चमक आ गई। भीनी भीनी केक की खुशबू हवेली का रास्ता जैसे खुद ही बता रही थी।

घोड़ों के टापों की आवाज़ सुनकर बुढ़िया खुद ही खिड़की से बाहर झांककर देखने लगी।

राजा के सैनिको को देखकर वह दौड़ी-दौड़ी दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई।

महामंत्री घोड़े से उतरकर बुढ़िया के पास गया और मुस्कुराते हुए बोला – “हमारे राजा ने होली के दिन सिर्फ़ आपका केक खाने के लिए कहा है इसलिए उस दिन तक दस केक बनाकर दे दीजिये।”

बुढ़िया खुश होती हुई बोली – “दस क्या मैं तो बीस केक बनाकर दे दूँ पर…”

“पर क्या…” महामंत्री ने आश्चर्य से पूछा।

बुढ़िया ने आसमान की ओर ताकते हुए कहा – “पर एक भी बादल नज़र नहीं आ रहा है, लग रहा है पानी नहीं बरसेगा।”

बुढ़िया की बात सुनकर महामंत्री और सैनिक भी आसमान की ओर देखने लगे।

तभी महामंत्री बोला-“पर जब बात केक की हो रही है तो आप बादल क्यों ढूँढ रही है?

“क्योंकि बिना बरसात के मेरा केक स्वादिष्ट नहीं बन पाता है” बुढ़िया बोली, जो अभी भी बादल ढूँढने की कोशिश कर रही थी।

महामंत्री कुछ गुस्से से बोला – “आप राजा के लिए केक नहीं बनाना चाहती है, इसलिए इस तरह की अजीबोगरीब बातें कर रही है।”

तभी पीछे से एक सैनिक बोला – “हमें तो दूर से ही केक की खुशबू आ गई थी तो बिना बारिश के वह केक कैसे बन गया था।”

“तुम लोगो के आने के कुछ देर पहले तक बूँदा-बाँदी हो रही थी। देखो, अभी तक तुम्हारे पैरों के आसपास की मिट्टी गीली है” बुढ़िया ने धीरे से कहा।

बात तो सही थी चारों तरफ़ मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ-साथ ज़मीन भी गीली नज़र आ रही थी।

पर महामंत्री का गुस्सा, इन बेसिर पैर की बातों को सुनकर बढ़ता ही चला जा रहा था।

वह गुस्से से बोला – “तो आपको इसी समय राजमहल चलना पड़ेगा।”

बेचारी बुढ़िया डर के मारे थर थर काँपने लगी। उसने महामंत्री को समझाने की बहुत कोशिश की पर महामंत्री के साथ साथ, उसकी बात पर कोई सैनिक भी विश्वास नहीं कर रहा था।

होली स्पेशल: राजा की होली केक के संग
होली स्पेशल: राजा की होली केक के संग

तभी बुढ़िया बोली – “मैं अपनी पोटली तो रख लूँ, फिर चलती हूँ।”

महामंत्री जब तक उसे रोकता, बुढ़िया दरवाज़े के अंदर चली गई।

कुछ ही देर बाद वह दोनों हाथों में एक बड़ी सी पोटली लेकर बाहर आ गई।

गाँव के लोग बुढ़िया की हालत देखकर बहुत दुखी थे पर महामंत्री के डर के कारण कोई भी बुढ़िया की मदद नहीं कर पा रहा था।

डर से काँपती हुई बुढ़िया महामंत्री के साथ अपने आँसूं पोंछती हुई चल दी।

रास्ते भर वह मन ही मन राजा को अपनी बात समझाने का अभ्यास करती रही ताकि राजा समझ सके कि वह सच बोल रही है।

पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। राजा से बात करने का तो उसे मौका तक नहीं दिया गया। राजमहल पहुँचते ही महामंत्री ने उसे कारागार में डलवा दिया।

बुढ़िया बार बार कहती रही कि उसे राजा से मिलने का एक मौका दिया जाए पर किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

राजा को जब बारिश होने पर ही केक बनाने की बात का पता चला तो वह भी बुढ़िया के ऊपर बहुत नाराज़ हुआ और उसने भी बुढ़िया को बंद रहने की ही सजा सुनाई।

इसी तरह कई दिन बीत गए।

बेचारी बुढ़िया समझ ही नहीं पा रही थी कि वह सबको कैसे बताये कि वह निर्दोष है।

एक दिन हिम्मत करके वह एक द्वारपाल से बोली – “क्या इस जगह पर बारिश नहीं होती है?”

द्वारपाल हँसता हुआ बोला – “होती क्यों नहीं है हैं, पर जब बारिश का मौसम होता है, तभी होती है।”

बुढ़िया अपने गाँव को याद करते हुए बोली – “पर हमारे गाँव में तो साल में करीब दस महीने बारिश होती है। वहाँ बहुत ठंड पड़ती है ना…”

द्वारपाल बोला – “तुम्हें बारिश पसंद है तो अब जब बारिश होगी, मै तुम्हें बता दूंगा। तुम थोड़ा सा बाहर चलकर देख लेना।”

बुढ़िया यह सुनकर बहुत खुश हो गई।

दो दिन बाद ही वह द्वारपाल दौड़ता हुआ आया और बोला – “आज बहुत तेज बारिश हो रही है, चलकर देखोगी?”

“नहीं , नहीं… तुम बस थोड़ी सी देर रूको और यह केक का सामान में तुम्हें बनाकर दे रही हूँ इसे बस तंदूर में रखवा देना” बुढ़िया अपनी पोटली खोलते हुए बोली।

द्वारपाल आश्चर्य से बोला – “तो क्या सच में तुम बारिश में ही केक बनाती हो?”

बुढ़िया यह सुनकर मुस्कुराई और फटाफट अपनी पोटली से सामान निकालकर केक बनाने की चीज़े अच्छे से मिलाने लगी।

कुछ ही देर बार उसने द्वारपाल को वह मिश्रण एक तश्तरी में रखकर दे दिया और कहा – “इसे तंदूर में रखवा देना। राजा इसे खाकर बहुत खुश हो जाएगा और शायद तब मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ।”

द्वारपाल भी बुढ़िया को कैद में देखकर बहुत दुखी होता था इसलिए वह सीधे राजमहल के रसोइये के पास पहुँच गया।

पहले तो रसोइये ने द्वारपाल की बात पर विश्वास नहीं करते हुए सीधे मना कर दिया।

पर द्वारपाल ने बुढ़िया की स्तिथी बताते हुए उससे बहुत विनती, जिसे सुनकर रसोइया मन मारकर उसकी बात मानने के लिए तैयार हो गया।

जैसे-जैसे तंदूर में केक पकता गया राजमहल में चारों ओर ताजे केक की भीनी भीनी सुगंध फैलने लगी, रसोइया, द्वारपाल, मंत्री, वजीर, दरबारियों से लेकर रानी और राजकुमारी तक के मुँह में पानी आ गया।

राजा ख़ुशी से उछलता हुआ बोला – “यहीं है वह सुगंध … तुरंत यह केक मेरे लिए लाया जाए।”

जैसे ही रसोइये को पता चला कि राजा ने केक मँगवाया है वह भागता-दौड़ता, गिरता-पड़ता, केक लेकर दरबार जा पहुँचा।

राजा ने केक का टुकड़ा हाथ में पकड़ते हुए प्रशंसा भरी नज़रों से पूछा – “यह केक किसने बनाया है?”

रसोइये ने राजा को द्वारपाल की पूरी बात बताते हुए बुढ़िया के बारे में बता दिया।

बुढ़िया के बारें में सुनकर, राजा की आँखें भर आई।

वह हाथ में पकड़े हुए टुकड़े को वापस रखते हुए बोला – “मैं सबसे पहले उस “केक वाली बुढ़िया” से मिलना चाहूँगा।”

और कहना ना होगा कि राजा ने बुढ़िया से माफ़ी माँगते हुए उसे ढेर सारे उपहारों से लाद दिया और उसे अपने साथ राजमहल में ही रहने की विनती करी।

पर बुढ़िया को तो अपने गाँव के लोगो की बहुत याद आती थी इसलिए वह राजमहल में रुकने को तैयार नहीं हुई।

पर राजा इस बार उसकी भावनाएँ समझ गया और उसने बुढ़िया को पूरे मान सम्मान के साथ विदा किया।

पर अब जब भी होली का त्यौहार आता है या उसके आस पास हलकी बूंदा बांदी होती है या जोर से बिजली कड़कने के बाद झमाझम बारिश होती है तो राजा जमकर रंग खेलने के बाद, बुढ़िया की हवेली जाकर नरम स्वादिष्ट केक खाना कभी नहीं भूलता है।

डॉ. मंजरी शुक्ला

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