Hindi Detective Story about Diwali and Thieves दीवाली की रात

दिवाली की रात: दिवाली पर हिंदी जासूसी कहानी

चन्दन चौदह वर्षीय एक चंचल और चतुर लड़का था। घर से लेकर स्कूल तक सभी उसकी बुद्धिमानी का लोहा मानते थे। जितना वह पढ़ाई लिखाई में अच्छा था उतना ही खेल कूद में भी। हर साल की तरह इस बार भी उसने और उसके दोस्तों ने दिवाली को बड़े ही धूम-धाम से मनाने का निश्चय किया।

बच्चों की टोली जब दिवाली मनाने के लिए नए-नए प्लान बना रही थी कि तभी चन्दन बोला – “पर मम्मी कह रही थी कि हमें इस बार दिवाली पर कुछ ज्यादा ही चौकन्ना रहना होगा क्योंकि हमारे मोहल्ले के आस पास सभी जगह हर रोज चोरिया हो रही हैं।”

तभी पिऊष एकदम से उठ खड़ा हुआ और बोला – “अरे, जल्दी में घर का ताला लगाना ही भूल गया। मैं बस अभी गया और अभी आया।”

यह सुनकर मिंटू हँसता हुआ बोला – “तेरा घर तो हमें यहाँ से ही दिख रहा हैं। और आज तक तो तूने कभी घर के सामने ही बैठकर ताला नहीं लगाया। फिर आज क्या हो गया?”

पिऊष भागते हुए बोला – “मम्मी कह रही थी कि अगर चोर हमारे मोहल्ले में आ गए तो?”

उसकी बात सुनकर सभी दोस्त हँसते हँसते अचानक गंभीर हो गए।

चन्दन कुछ सोचते हुए बोला – “दोस्तों मेरे पास एक प्लान हैं। अगर तुम लोग मेरी मदद करो तो हम लोग चोरों को बड़ी ही आसानी से पकड़ सकते हैं।

“पर हम सब तो अभी बच्चे हैं… हम भला कैसे पकड़ेंगे चोर को” – संजीव ने तुरंत कहा।

“अच्छा बच्चू… जब पापा के साथ जिद करके उनका स्कूटर चलाते हो तब तो सबसे कहते हो कि तुम बड़े हो गए हो… फिर अचानक बच्चे कैसे बन गए?”

“हा हा हा… अरे में तो यूँ ही जरा मजाक कर रहा था… संजीव झेंपता हुआ बोला।”

“तुम लोग सब तरफ यह अफवाह फैला दो कि मेरे पापा की बीस लाख की लाटरी निकली हैं और पैसे अभी तक हमने घर में ही रखे हुए हैं…” चन्दन कुछ सोचता हुआ बोला।

पियूष घबराते हुए बोला – “तू पागल तो नहीं हो गया हैं। इस तरह से तो वो चोर तुम्हारे घर चोरी करने आ जाएंगे”।

“हाँ यही तो मैं चाहता हूँ ना… और मैं ये जानता हूँ कि इतनी बड़ी रकम चुराने के लिए वो दिवाली के पहले ही आएंगे कहकर चन्दन धीरे से उन लोगो को अपना प्लान बताने लगा।”

यह सुनकर सभी के चेहरों पर मुस्कान छा गई।

बस फिर किया था उसके दोस्तों ने सब तरफ यह खबर उड़ा दी कि चन्दन की बीस लाख की लाटरी लग गई हैं।

जब सारे शहर में यह खबर आग की तरह फ़ैल गई तो भला चोरो को कैसे ना पता चलती जो हमेशा सबके घरों के रुपये पैसे के बारे में पता करते रहते थे।

उन चोरों का नाम था भीखू और मीखू… वो दोनों इतनी सफ़ाई से चोरी करते थे कि किसी को उन पर जरा सा भी शक नहीं होता था।

जब बीस लाख की लाटरी वाली खबर उनके कानों में पड़ी तो वे दोनों चन्दन के घर चोरी करने के लिए बैचेन हो उठे।

भीखू बोला – “हमें दिवाली के पहले ही जाकर चोरी करनी चाहिए ताकि हमारी दिवाली हो और उनका दीवाला…”।

हा हा हा… जोरो से हँसते हुए मीखू बोला – “हम दोनों आज ही रात उनके घर चोरी करने जाएंगे।”

बस फिर क्या था वे दोनों आधी रात के समय चन्दन के घर पहुँच गए और घर के चारों ओर घूमकर अंदर जाने का रास्ता ढूंढने लगे।

तभी मीखू ने देखा कि मकान के पीछे की खिड़की खुली हुई थी। यह देखकर वह ख़ुशी के मारे उछल पड़ा और भीखू को इशारे से दिखाया।

भीखू के चेहरे पर भी मुस्कान तैर गई और वे दोनों दबे पाँव खिड़की से अंदर दाखिल हुए। कमरे के अंदर पहुंचकर उन्होंने देखा कि खिड़की के बगल में एक अलमारी रखी हुई थी और उसी के पास जमीन पर बहुत सारे जलते हुए दिए रखे थे।

मीकू बोला – “लगता हैं ये दिवाली हमरे लिए गुड फार्च्यून लेकर आई हैं।”

“हाँ… देखो इस मोटे से बण्डल में कुछ लिपटा हुआ रखा हैं।”

उन दोनों ने ख़ुशी के मारे एक दूसरे को गले लगा लिया क्योंकि वे दोनों समझ चुके थे कि नोटों का बण्डल उन्हें बड़ी ही आसानी से मिल गया था।

भीखू बोला – “जल्दी बण्डल खोलो क्योंकि आज तो हम दोनों लखपति बन गए।”

हाँ… मैं भी कौन सा रूक पा रहा हूँ? कहते हुए मीखू ने अखबार हटाना शुरू किया कि तभी उसकी डर के मारे चीख निकल गई क्योंकि उसके हाथों में दो छिपकलियाँ आ गई थी।

भीकू डर के मारे जोरो से चीखा और मीखू ने भी छिपकली देखते ही झटके से बण्डल जमीन पर फेंक दिया।

बण्डल का जमीन पर गिरना था कि वहाँ पर धूम! धड़ाक ! बूम! फटाक! की आवाज़ें आना शुरू हो गई।

भीखू और मीखू तो पहले से ही इतना डरे हुए थे की पटाखों के फूटने की आवाज़ सुनकर वहीँ अलमारी के पीछे चुप गए।

तभी चन्दन वहाँ पर अपने मम्मी पापा, दोस्तों और पड़ोसिओं के साथ आ गया और कमरे की बत्ती जल दी।

सभी ने तुरंत भीकू और मीखू को पकड़ लिया जो अभी तक डर के मारे काँप रहे थे।

चन्दन आगे आया और जमीन पर पड़ी नकली छिपकलियाँ उठाते हुए बोला – “इनसे डर गए थे तुम? और इस बण्डल में लाटरी के रूपये नहीं बल्कि छोटे वाले लाल बम भरे थे तो तुम्हारे हाथ से छुटते ही इन दीयों पर गिरे और फूटने लगे।

चन्दन के पापा बोला – “वाह बेटा तुमने और तुम्हारे दोस्तों की सूझबूझ और अक्लमंदी ने इन दोनों शातिर चोरों को पकड़वा दिया।”

हाँ पापा… ये दिवाली भी इनके लिए यादगार रहेगी क्योंकि अब ये लोग चोरी करना छोड़ देंगे।

भीखू धीरे से बोला “और छिपकलियों से डरना भी…”

और यह सुनते ही सभी जोरो से हंस पड़े और दूसरे दिन का अखबार चन्दन और उसके दोस्तों के साहस और बुद्धिमानी के किस्सों से भरा पड़ा हुआ था।

डॉ. मंजरी शुक्ल

आपको डॉ. मंजरी शुक्ला जी की यह कहानी “दिवाली की रात” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

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