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हास्यप्रद बाल-कहानी: ऐसे मना दशहरा

हास्यप्रद बाल-कहानी: ऐसे मना दशहरा

“दशहरे पर मैं रावण देखने जाऊंगी” दस साल की चित्राणी ने एलान कर दिया।

“और मैं हमेशा की तरह नहीं ले जाऊँगा” पापा ने अखबार पढ़ते हुए ही जवाब दिया।

“क्या हो जाएगा, अगर हम लोग रावण देखने चले जाएँगे… पूरी दुनिया तो जाती है” मम्मी ने हर साल की तरह रटा रटाया वाक्य दोहराया।

मम्मी की बात पर चित्राणी और पापा ने एक दूसरे की तरफ़ देखा और ठहाका मारकर हँस पड़े।

दशहरे के आने से पहले सुबह और शाम का यही टॉपिक रहता था, चित्राणी रावण देखने की जिद करती, पापा मना करते और मम्मी चित्राणी का पक्ष लेते हुए तुरंत आगे आ जाती।

थोड़ी देर जिद करने के बाद चित्राणी रावण वाली बात को भूलकर छुट्टियों की बात पर आ गई और मम्मी के साथ घूमने की प्लानिंग करने लगी।

पर जैसे ही पापा ने शाम को ऑफ़िस से लौटकर समाचार सुनने के लिए टीवी खोला तो उसमें रामलीला मैदान के बारे में ही बताया जा रहा था।

पापा ने तुरंत रिमोट से चैनल बदलने की कोशिश की पर तब तक चित्राणी की नज़र रावण के पुतले पर पड़ चुकी थी।

बस फ़िर क्या था, चित्राणी ने रोना धोना शुरू कर दिया और अपनी बात मनवाकर ही दम ली।

रावण देखने की बात अब पूरा मोहल्ला जान चुका था यहाँ तक कि चित्राणी की बिल्ली “पूसी” भी यह बात सुनकर इतना थक चुकी थी कि वह चुपचाप जाकर सोफ़े के नीचे छुप गई थी।

शाम का इंतज़ार ऐसे हो रहा था जैसे चित्राणी का जन्मदिन हो। क्योंकि साल भर में सिर्फ़ एक वही दिन था जब चित्राणी केक काटने और दोस्तों के साथ खूब मस्ती करने के लिए शाम का रास्ता देखती रहती थी।

बार बार “दशहरे पर मैं रावण देखने जाऊंगी” दस साल की चित्राणी ने एलान कर दिया।

“और मैं हमेशा की तरह नहीं ले जाऊँगा” पापा ने अखबार पढ़ते हुए ही जवाब दिया।

“क्या हो जाएगा, अगर हम लोग रावण देखने चले जाएँगे… पूरी दुनिया तो जाती है” मम्मी ने हर साल की तरह रटा रटाया वाक्य दोहराया।

मम्मी की बात पर चित्राणी और पापा ने एक दूसरे की तरफ़ देखा और ठहाका मारकर हँस पड़े।

दशहरे के आने से पहले सुबह और शाम का यही टॉपिक रहता था, चित्राणी रावण देखने की जिद करती, पापा मना करते और मम्मी चित्राणी का पक्ष लेते हुए तुरंत आगे आ जाती।

थोड़ी देर जिद करने के बाद चित्राणी रावण वाली बात को भूलकर छुट्टियों की बात पर आ गई और मम्मी के साथ घूमने की प्लानिंग करने लगी।

पर जैसे ही पापा ने शाम को ऑफ़िस से लौटकर समाचार सुनने के लिए टीवी खोला तो उसमें रामलीला मैदान के बारे में ही बताया जा रहा था।

पापा ने तुरंत रिमोट से चैनल बदलने की कोशिश की पर तब तक चित्राणी की नज़र रावण के पुतले पर पड़ चुकी थी।

बस, फ़िर क्या था, चित्राणी ने रोना धोना शुरू कर दिया और अपनी बात मनवाकर ही दम ली।

रावण देखने की बात अब पूरा मोहल्ला जान चुका था यहाँ तक कि चित्राणी की बिल्ली “पूसी” भी यह बात सुनकर इतना थक चुकी थी कि वह चुपचाप जाकर सोफ़े के नीचे छुप गई थी।

शाम का इंतज़ार ऐसे हो रहा था जैसे चित्राणी का जन्मदिन हो। क्योंकि साल भर में सिर्फ़ एक वही दिन था जब चित्राणी केक काटने और दोस्तों के साथ खूब मस्ती करने के लिए शाम का रास्ता देखती रहती थी।

वह बार बार घर भर की सारी घड़ियों का टाइम देख रही थी।

पापा और मम्मी चित्राणी के उत्साह और ख़ुशी देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे।

शाम होते ही पापा ने चित्राणी से कहा – “जल्दी चलो, वरना रावण जल जाएगा और तुम देख नहीं पाओगी।”

“मैं पिछले एक घंटे से कार के अंदर ही बैठी हूँ” कार की पीछे की सीट से चित्राणी की आवाज़ आई।

पापा ने हड़बड़ाते हुए पीछे देखा तो चित्राणी पूसी को गोद में लिए हुए बैठी थी।

“हे भगवान्… बिल्ली” पापा ने लगभग चीखते हुए कहा।

चित्राणी ने हँसते हुए कहा – “पापा, आप इसे पहचानते नहीं हो क्या? ये तो अपनी पूसी है”।

मम्मी चित्राणी की बात सुनकर हँस दी और बोली – “वो तो ठीक है पर पूसी रामलीला मैदान में जाकर क्या करेगी”?

“अरे, ये भी हमारे साथ जलता हुआ रावण देखेगी” चित्रणी पूसी के ऊपर हाथ फेरते हुए बोली।

पूसी ने चित्राणी की तरफ़ देखा और उसकी गोद से सरकते हुए बोली – “नहीं, मुझे पटाखों से बहुत डर लगता है। मुझे छोड़ दो।”

पर चित्राणी और उसके मम्मी पापा सिर्फ़ “म्याऊँ म्याऊँ” की आवाज़ें ही सुन पा रहे थे।

चित्राणी बोली – “हाँ… हां… मैं जानती हूँ पूसी कि तुम्हें भी हमारे साथ चलना है।”

पापा जानते थे कि चित्राणी बिना पूसी के नहीं जाएगी इसलिए उन्होंने बिना कुछ कहे कार स्टार्ट कर दी।

मैदान के पास पहुँचते ही लोगो की भीड़ देखकर पापा ने कार एक कोने में खड़ी कर दी।

कार से उतरते ही चित्राणी जैसे मंत्रमुग्ध हो गई। बड़े बड़े झूलों पर रंगबिरंगी बत्तियाँ जगमगा रही थी।

लाऊडस्पीकर पर खूब तेज आवाज़ में गाने बज रहे थे।

मेले के मुख्य द्वार पर ही ढेर सारी दुकानें सजी हुई थी। कहीं गुड़ियाँ नाच रही थी तो कहीं रंगबिरंगी गेंद खुद ब खुद उछल रही थी।

चित्राणी ख़ुशी से चहकते हुए बोली – “पूसी, कितना मज़ा आ रहा है ना”?

पूसी तो पहले ही डरी हुई थी। चित्राणी की बात सुनकर उसने खुद को और सिकोड़ लिया।

पापा चित्राणी का हाथ पकड़ते हुए बोले – “अब हाथ पकड़े रहना वरना इतने बड़े मेले में खो जाओगी।”

पर चित्राणी की नज़र तो सामने आइसक्रीम खाते बच्चों पर टिकी हुई थी।

उसने मम्मी की ओर देखा तो मम्मी बोली – “चलो, सब आइसक्रीम खाते है।”

चित्राणी दौड़ती हुई आइसक्रीम के ठेले पर पहुँच गई और अपनी मनपसंद आइसक्रीम ऑर्डर कर दी।

वह खा तो आइसक्रीम रही थी पर कोने की दुकान में बड़ी सी कढ़ाई से गरमा गरम गर्म जलेबी छन कर बाहर आ रही थी।

मम्मी उससे बोली – “पहले मेला तो घूम लो फ़िर सब खा लेना।”

चित्राणि मुस्कुराने लगी और बोली – “पर याद रखना, मुझे जलेबी खानी है।”

पापा बोले – “तुम शायद भूल चुकी हो कि तुम यहाँ पर रावण देखने आई हो।”

चित्राणी जो अब तक सच में भूल चुकी थी कि वह रावण देखने आई थी, घबरा उठी और पापा का हाथ पकड़ते हुए बोली – “पापा, जल्दी चलो, कहीं ऐसा ना हो कि रावण जल जाए और हम सिर्फ़ पटाखों की आवाज़ ही सुन पाए।”

उधर मेले में घूमते कुत्तों को देखकर पूसी की जान सूख रही थी। वह डर के कारण अपनी आँखें बंद कर लेती थी। उसका बस चलता तो कूद काद कर कहीं भाग जाती पर चित्राणि ने उसे इतने जोरों से पकड़ रखा था कि भागना तो दूर हिलना भी नामुमकिन था।

पूसी ने एक नज़र पतली दुबली चित्राणी को देखा और सोचा दुबले पतले लोगो को भी कभी कम नहीं आँकना चाहिए।

तभी चित्राणी ख़ुशी से चीखते हुए बोली – “वो देखो पापा… रावण के तीर लगने जा रहा है।”

पूसी जब तक उसकी बात का मतलब समझ पाती चारों तरफ से धूम! धड़ाक! फ़टाक! की आवाज़ें आने लगी।

पटाखों के नाम से ही पूसी का खून सूख जाता था, यहाँ तो हज़ारों पटाखें उसके सामने फूट रहे थे। उसने चित्राणी की पकड़ ढीली होते देख तुरंत छलाँग मारी और कूद गई।

चित्राणी को तो जैसे साँप सूँघ गया। पापा और मम्मी भी पूसी को भागते देख उसे पकड़ने को दौड़े।

पर बहुत दूर तक ढूँढने के बाद भी पूसी का कोई अता पता नहीं था।

पापा को चित्राणी पर बहुत गुस्सा आ रहा था पर उसे जोर जोर से रोता हुआ देखकर, वह उसे कुछ कह भी नहीं पा रहे थे।

तभी चित्राणी की नज़र एक बच्चे पर पड़ी जो गुब्बारे बेच रहा था। उसने एक हाथ में कई गुब्बारे और दूसरे हाथ में पूसी को गोद में उठा रखा था

“पापा… पूसी…” चित्राणी चिल्लाते हुए उस लड़के की ओर दौड़ी।

लड़का इन लोगो को देखकर घबरा गया और उसने पूसी को कस कर अपने से चिपटा लिया।

“वापस करो मेरी पूसी” चित्राणी उस लड़के से बोली।

“नहीं करूँगा” उस लड़के ने भी टका सा जवाब दे दिया।

चित्राणी ने रुआँसे होते हुए पापा की तरफ़ देखा तो पापा बड़े ही प्यार से उस लड़के से बोले – “बेटा, ये बिल्ली तुम्हें कहाँ से मिली”?

“थोड़ी देर पहले यहीं पर बैठी थी तो मैंने गोद में उठा लिया” वह लड़का बिल्ली को देखता हुआ बोला।

पापा ने कहा – “अगर मैं तुम्हारे यह सारे गुब्बारे खरीद लूँ तो क्या तुम इस बिल्ली को मुझे दे दोगे”?

लड़का मुस्कुरा दिया और बोला – “अगर आधे गुब्बारे खरीद लोगे तब भी दे दूँगा”।

पापा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और तीन सौ रुपये देकर तीन गुब्बारे ले लिए।

“पर… ये तो बहुत ज़्यादा है” लड़के ने काँपते हुए सौ के तीन नोट पकड़ते हुए कहा।

“हाँ…पर तुमने हमारी बिल्ली को इतना सँभालकर अपने पास भी तो रखा था। अब तुम आराम से मेला घूमो।”

लड़के की ख़ुशी देखते ही बनती थी। वह हवा की गति से दौड़ा और भीड़ में गायब हो गया।

चित्राणी ने पूसी को गले से लगा लिया और उसे चूमती हुई चल दी।

इस भागा दौड़ में सब इतना थक चुके थे कि जलेबी की दुकान पर सबने एक दूसरे की ओर देखा और निढाल होते हुए कार की तरफ़ चल दिए।

कार के पास पहुँचने पर पापा ने जैसे ही आगे का दरवाज़ा खोला तो उनके पैरों पर कुछ आकर कूदा।

घबराहट में पापा के मुँह से चीख निकल गई। जब पापा के साथ साथ चित्राणी और मम्मी ने भी पापा के पैरों की ओर देखा तो उनके चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगी।

पापा के पैरों के पास पूसी बैठी हुई थी।

चित्राणी ने गोद में पकड़ी बिल्ली को अब जाकर गौर से देखा। उसके माथे पर तो सफ़ेद धब्बा था ही नहीं।

मम्मी ने पूसी को उठाया और कार के अंदर बैठ गई।

कुछ ही पलों बाद दोनों बिल्लियाँ आपस में उछाल कूद कर रही थी और चित्राणी के साथ साथ पापा और मम्मी हँसते हुए दोहरे हुए जा रहे थे।

~ डॉ. मंजरी शुक्ला

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