उड़ी पतंग – डॉ. मोहम्मद साजिद खान

आसमान का मौसम बदला,
बिखर गई चहुँओर पतंग।
इंद्रधनुष जैसी सतरंगी,
नील गगन की मोर पतंग॥

मुक्त भाव से उड़ती ऊपर,
लगती है चितचोर पतंग।
बाग तोड़कर, नील गगन में,
करती है घुड़दौड़ पतंग॥

पटियल, मंगियल और तिरंगा,
चप, लट्‍ठा, त्रिकोण पतंग।
दुबली-पतली सी काया पर,
लेती सबसे होड़ पतंग॥

कटी डोर, उड़ चली गगन में,
बंधन सारे तोड़ पतंग।
लहराती-बलखाती जाती,
कहाँ न जाने छोर पतंग॥

∼ डॉ. मोहम्मद साजिद खान

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