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रिम झिम बरस रहा है पानी - राजीव कृष्ण सक्सेना

रिम झिम बरस रहा है पानी: मानसून बारिश पर कविता

वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तरी गोलार्द्ध में जो अतिआक्रामक प्रदूषण हो रहा है, उससे दक्षिणी गोलार्द्ध प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकता है? थर्मल पॉवर प्लांट्स से निकलने वाली कार्बन डाई-ऑक्साइड और सल्फर डाई-ऑक्साइड दुनिया के कई-कई देशों सहित भारत में भी तबाही मचा रही है। इंपीरियल कॉलेज, लंदन के एक शोध में बताया गया है कि यूरोप में वायु-प्रदूषण-विस्तार के चलते यूरोप से करीब छः हजार किलोमीटर दूर स्थित भारत, वर्ष 2000 में कितने विकराल सूखे से प्रभावित हुआ था? स्मरण रखा जा सकता है कि तब हमारे देश में एक करोड़ तीस लाख से भी कहीं ज़्यादा लोग सूखे की भयानकता के शि‍कार हुए थे।
भारतीय मौसम विभाग का मौसम संदर्भित पूर्वानुमान भले ही प्रसन्नतादायक कहा जा सकता है, लेकिन स्काईमेट का, सर्वेक्षण आधारित अनुमान, हमें वाकई चिंतित करने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि देश में होने वाली सत्तर फीसदी बारिश इन्हीं चार महीनों (जून से सितंबर) के दौरान होती है। कमजोर मानसून की आशंका से चिंता इसलिए भी होती है कि हमने सूखे और कम बारिश के संकट से अभी भी कोई सबक नहीं लिया है। वाकई यह देखना बेहद दिलचस्प रहेगा कि तमाम शंकाओं और संभावनाओं के बावजूद, इस बरस बारिश कैसी रहेगी ?

रिम झिम बरस रहा है पानी: राजीव कृष्ण सक्सेना

Monsoon rains would soon hit India. After grilling heat, we are all ready to welcome the cool raindrops with open arms. Here is a poem welcoming Varsha Rani…

गड़ गड़ गड़ गड़ गरज गरज घन
चम चम चमक बिजुरिया के संग
ढम ढम ढम ढम पिटा ढिंढोरा
झूम उठा सारा जन जीवन

उमड़ घुमड़ कर मेघों नें अब
आंधी के संग करी चढ़ाई
तड़क तड़क तड़िता की सीढ़ी
उतर गगन से वर्षा आई

अरसे से बेहाल धरा पर
सूखे वृक्षों पर खेतों पर
झूम बदरिया छाई घिर घिर
ताप धरा का हरने को फिर

बुनी चुनरिया उसने धानी
रिम झिम बरस रहा है पानी

भटक रहे थे प्यासे प्यासे
पंछी इधर उधर बौराए
थक निढाल हो कर सुस्ताते
पथिक किनारे पर मुरझाए

झुलसाने वाली गर्मी से
त्राण सभी पाते हैं प्राणी
तुरहि बजाओ थाल सजाओ
आ पहुंची है वर्षा रानी

सोंधी सोंधी उठी सुगंधी
पवन हो गयी ठंडी ठंडी
उल्लासित तन मन करती है
नव ऋतु की मोहक सारंगी

मस्त पवन करती मनमानी
रिम झिम बरस रहा है पानी

बेमतलब मन की उधेड़बुन
बेमतलब ही मन उदास था
बेमतलब ही गुमसुम गुमसुम
भटक रहा कुछ आसपास था

झीनी झीनी सी बूंदें अब
चेहरे पर नवजीवन भरतीं
और अनमनी सी लट पर गिर
लटक लटक अठखेली करतीं

कैद उमंगें थीं जिनमें वह
अंतर के बंधन खुलते हैं
और मस्त इन बौछारों में
मैल सभी मन के धुलते हैं

होठों पर अब तान पुरानी
रिम झिम बरस रहा है पानी

इस पल में ऐसा लगता ज्यों
शांत व्यथाएं सभी जगत की
यह पल ऐसा जैसे की सब
भूल गए खटपट जीवन की

इस पल में सब सुधबुध खो कर
मस्त बदरिया को लखते हैं
इस पल में एकाग्र हूआ मन
शोक सभी जग के हटते हैं

कुंठाएं सब भूल समय यह
अवसादों को ढकने का है
यह अमूल्य क्षण शांत खड़े हो
बौछारों को तकने का है

छटा अलौकिक छटा सुहानी
रिम झिम बरस रहा है पानी

कितना है उत्पात जगत में
कितनी हिंसा मारा मारी
और गरीबी बेहाली में
पिसती रहती जनता सारी

आज मगर वर्षा की बूंदों
के गिरने की टप टप ही है
दूर दूर तक खाली सड़कें
राग कोइ वर्षा का गाएं

तारकोल के रंगमंच पर
लाज शर्म सब छोड़ मगन हो
मस्त मुदित मन छाम छाम नाचें
घनदल की प्यारी कान्याएं

तिनक तिनक धिन दिर दिर धानी
रम झिम बरस रहा है पानी

छत का पानी गलियों के
पतनालों से मिलने को उत्सुक
और पेड़ कुछ बहुत यत्न से
धोते हैं पत्तों को गुपचुप

बाहर के आले में भीगी
गौरैया तकती आशंकित
बागीचे में बेल चमेली की
चम्पा को छेड़े छिप छिप

नन्हें बच्चे दीदी से
कागज की नावें बनवाते हैं
भीग भीग कर उनको बाहर
पतनालों में तैराते हैं

किलकारी जानी पहचानी
रिम झिम बरस रहा है पानी

राजीव कृष्ण सक्सेना

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