नूतन वर्ष – राजीव रंजन प्रसाद

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Nutan Varshनवीनता के पंख होते हैं
और वर्ष पलों के पंखों से
उड़ता थामे आता है
थरिया भर आसमान सितारों भरा
मेरी आँखों की धरती में टाँक जाता है चंदा
कि धरती में खुशबू भर जाएगी अबके बरस
कि उम्मीद कठपुतली न रहेगी बल्कि नाचेगी
कि आशा बाँसुरी बजाएगी
कि मन के पास धरती होगी
और धरती के पास सोना
और मेरे स्वजन
हमारी आत्मीयता का विश्वास भी तो
फूलों से लद जाएगा
अंतरंगता की नदी का कोकिल कलरव
तार बन गूथ देगा हम तुम को
और मधुरता आसमान से इतनी ऊँची हो लेगी
जितनी ऊँची होती है बुजुर्गों की दुआ।
नवीनता में पुरातनता को अलविदा कहना है
लेकिन अनुभव जीवन का गहना है
तो फिर हर नवीन खुशियों में
जीवन की अदाओं का साथ भर देंगे
अपने दिल इतने पास कर देंगे
आपको अपने मन में घर देंगे
नवीनता इसलिए मुबारक हो
कि सोच के मौसम अब कि बदलेंगे
मुझको आशा है हर ग़लतफ़हमी
अब धुआँ न बन के फैलेगी।
बन के खुशबू हमारे मन के गुल कहते हैं
सब के साथ अपनी खुशियों का पर्वत हो
नूतन वर्ष स्वागत हो॥

∼ राजीव रंजन प्रसाद

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