माँ - श्रेया गौर Request from a girl child to her mother

माँ: श्रेया गौर – बाल भेदभाव पर हिंदी बाल-कविता

माँ! मैं कुछ कहना चाहती हूँ,
माँ! मैं जीना चाहती हूँ।

तेरे आँगन की बगिया में
चाहती हूँ मैं पलना,
पायल की छमछम
करती, चाहती मैं भी
चलना।

तेरी आँखों का तारा बन
चाहती झिलमिल करना,
तेरी सखी सहेली बन चाहती बातें करना।

तेरे आँगन की तुलसी बन,
तुलसी सी चाहती मैं हूँ बढ़ना,
मान तेरे घर का बन माँ! चाहती मैं भी पढ़ना।

मिश्री से मीठे बोल, बोलकर चाहती मैं हूँ गाना,
तेरे प्यार-दुलार की छाया चाहती मैं भी पाना।

चहक-चहक कर चिड़िया सी चाहती मैं हूँ उड़ना,
महक-महक कर फूलों सी चाहती मैं भी खिलना।

~ श्रेया गौर (छठी ‘स’) St. Gregorios School, Sector 11, Dwarka, New Delhi – 110075

आपको श्रेया गौर की यह कविता “माँ” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

यदि आपके पास Hindi / English में कोई poem, article, story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें। हमारी Id है: submission@4to40.com. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ publish करेंगे। धन्यवाद!

Check Also

जलियाँवाला बाग में बसंत - सुभद्रा कुमारी चौहान

जलियाँवाला बाग में बसंत: सुभद्रा कुमारी चौहान कविता

Jallianwala Bagh (जलियाँवाला बाग) is a public garden in Amritsar, and houses a memorial of …