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कृष्ण मुक्ति: राजीव कृष्ण सक्सेना

कृष्ण मुक्ति: राजीव कृष्ण सक्सेना

कितना लम्बा था जीवन पथ,
थक गए पाँव डेग भर भर कर,
ढल रही साँझ अब जीवन की,
सब कार्य पूर्ण जग के इस पल।

जान मानस में प्रभु रूप जड़ा,
यह था उत्तरदायित्व बड़ा,
सच था या मात्र छलावा था,
जनहित पर मैं प्रतिबद्ध अड़ा।

अब मुक्ति मात्र की चाह शेष,
अब तजना है यह जीव वेश,
प्रतिविम्ब देह की माया थी,
माया था जीवन काल देश।

अब है बंसी की मुक्त तान,
जीवन का अंतिम वृंदगान,
कुछ पल जग में उन्मुक्त हास्य,
फिर चिर प्रलय चिर गरल पान।

कैसा अदभुत था महायुद्ध,
या स्वप्न मात्र मन का विशुद्ध,
कुछ था अंतिम निरकारश वहां,
या नियति मात्र था काल कुद्ध।

ले कर के आया मुक्ति बाण,
पल में घाट से उड़ गए प्राण,
थी नियति व्याघ का काल तीर,
दृष्टा उस पल के मूक जीव।

जग के प्रपंच सब दिग दिगंत,
इक पल न रुके वे मूल तंत्र,
उस पल कलियुग प्रारम्भ हुआ,
द्वापर युग का हो गया अंत।

राजीव कृष्ण सक्सेना

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