Harivansh Rai Bachchan's Poem about Love & Frustration तब रोक न पाया मैं आँसू

कैसे भेंट तुम्हारी ले लूँ: बच्चन जी की निराश प्रेम कविता

Love requires great deal of efforts and full involvement. It exhausts the lovers. Then if one has to go through the whole process again! It is very difficult to revisit the old lanes and by lanes of love.

कैसे भेंट तुम्हारी ले लूँ: हरिवंश राय बच्चन

कैसे भेंट तुम्हारी ले लूँ
क्या तुम लाई हो चितवन में,
क्या तुम लाई हो चुंबन में,
अपने कर में क्या तुम लाई,
क्या तुम लाई अपने मन में,
क्या तुम नूतन लाई जो मैं
फिर से बंधन झेलूँ
कैसे भेंट तुम्हारी ले लूँ

अश्रु पुराने, आह पुरानी,
युग बाहों की चाह पुरानी,
उथले मन की थाह पुरानी,
वही प्रणय की राह पुरानी,
अध्र्य प्रणय का कैसे अपनी
अंतज्र्वाला में लूँ
कैसे भेंट तुम्हारी ले लूँ

खेल चुका मिट्टी के घर से,
खेल चुका मैं सिंधु लहर से,
नभ के सूनेपन से खेला,
खेला झंझा के झरझर से
तुम में आग नहीं है तब क्या,
संग तुम्हारे खेलूँ
कैसे भेंट तुम्हारी ले लूँ

हरिवंश राय बच्चन

जब बच्चन ने पहली बार मधुशाला का पाठ किया

पुष्पा भारती कहती हैं कि वो कवि सम्मेलनों का आयोजन करते थे जिसमें अक्सर बच्चनजी को बुलाया जाता था. वो मंच के पीछे कंबल ले कर बैठ जाती थीं और कवियों को सुनते सुनते उन्हें नींद आ जाया करती थी. लेकिन सोने से पहले वो अपने पिता से कहती थीं कि जब बच्चनजी मंच पर आएं तो उन्हें जगा दे. सबसे ज़्यादा वाहवाही हरिवंशराज बच्चन को ही मिलती थी. वो बताती हैं कि कई बार उन्होंने बच्चन को सुनते सुनते सुबह होते हुए देखी है. अजित कुमार की किताब ‘बच्चन निकट से’ में पंडित नरेंद्र शर्मा ने उस दिन का ज़िक्र किया है जब बच्चन ने पहली बार मधुशाला को मंच पर गाया था. वो कहती हैं, “मुझे मधुशाला का अत्यंत अनौपचारिक और भव्य उद्घाटन समारोह देखने का मौका मिला. वो आजकल जैसा कोई ग्रंथ विमोचन नहीं था. वो था एक कवि सम्मेलन बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय में. हॉल खचाखच भरा था. विद्यार्थी कई आमंत्रित कवियों को उखाड़ चुके थे.”

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