Home » Poems For Kids » Poems In Hindi » जीवन बीत चला: अटल की संघर्षमय ज़िन्दगी पर कविता
जीवन बीत चला - अटल बिहारी वाजपेयी

जीवन बीत चला: अटल की संघर्षमय ज़िन्दगी पर कविता

अपने जीवन में अटल बिहारी ने 27 से ज्यादा कविताएं लिखी हैं। आज उनके निधन पर नजर डालिए उन कविताओं पर जो उन्हें अमर बनाती हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कविता लिखी थी – दूध में दरार पड़ गई – ये कविता काफी लोकप्रिय हुई। उन्होंने इस कविता में देश की समस्या पर चिंता जताई। उनकी कविता कदम से कदम मिलाकर चलना होगा भी काफी लोकप्रिय रही। इस कविता में उन्होंने देश को एकजुट होकर चलने की बात कही थी। उनकी काफी सारी कविताओं में क्षमा याचना भी थी। इसमें वो महात्मा गांधी से माफी मांगते हैं। ये वो दौर था, जब जयप्रकाश नारायण का आंदोलन जारी था। वो जयप्रकाश को उम्मीद की नज़र से देखते हैं।

कौरव कौन, कौन पांडव नाम से भी अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कविता लिखी थी। महाभारत का रेफरेंस लेते हुए, वो अपनी बात कहते हैं। ये काफी लोकप्रिय हुई।

जीवन बीत चला: अटल बिहारी वाजपेयी

कल कल करते आज
हाथ से निकले सारे
भूत भविष्यत की चिंता में
वर्तमान की बाजी हारे

पहरा कोई काम न आया
रसघट रीत चला
जीवन बीत चला।

हानि लाभ के पलड़ों में
तुलता जीवन व्यापार हो गया
मोल लगा बिकने वाले का
बिना बिका बेकार हो गया

मुझे हाट में छोड़ अकेला
एक एक कर मीत चला
जीवन बीत चला।

अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी के पसंदीदा भोजन

बात कोई दो दशक पहले की है। आगरा में वाजपेयी-मुशर्रफ शिख़र वार्ता का आयोजन हुआ था। मेज़बान और मेहमान के खाने-पीने के बंदोबस्त का ज़िम्मा मेरे मित्र जिग्स कालरा को सौंपा गया था। मेनू बड़ी सावधानी से तैयार किया गया।

जिग्स ने मुझे ख़बरदार किया, “गुरू! वाजपेयी जी खाने के ज़बरदस्त शौक़ीन हैं – कुछ कसर न रह जाए। फिर मुल्क की इज़्ज़त का भी सवाल है। पाकिस्तानियों को नाज़ है अपनी लाहौर की खाऊ गली पर। हमें उन्हें यह जतलाना है कि सारा बेहतरीन खाना मुहाजिरों के साथ सरहद पार नहीं चला गया। इसके अलावा कुछ नुमाइश साझा विरासत की भी होनी चाहिए।”

ख़ुशक़िस्मती यह थी कि पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी पसंद-नापसंद थोपने का हठ नहीं पाला। बस शर्त रखी कि खाने का ज़ायका नायाब होना चाहिए। इस बात का हमारी पूरी टीम को गर्व है कि जो भी तश्तरियाँ उस गुप्त वार्ता वाले कमरे में भेजी जातीं, वह ख़ाली लौटती थीं।

लाने ले-जाने वाले मज़ाक़ करते थे कि मुशर्रफ़ तो तनाव में लगते हैं पर पंडित जी निर्विकार भाव से संवाद को भी गतिशील रखते हैं और चबैना भी निबटा रहे हैं।

वाजपेयी जी का अच्छा खाने-पीने का शौक़ मशहूर था। वह कभी नहीं छिपाते थे कि वह मछली-माँस चाव से खाते हैं। शाकाहार को लेकर जरा भी हठधर्मी या कट्टरपंथी नहीं थे। दक्षिण दिल्ली में ग्रेटर कैलाश-2 में उनका प्रिय चीनी रेस्तराँ था जहाँ वह प्रधानमंत्री बनने से पहले अकसर दिख जाते थे।

पुराने भोपाल में मदीना के मालिक बड़े मियाँ फ़ख्र से बताते थे कि वह वाजपेयी जी का पसंदीदा मुर्ग़ मुसल्लम पैक करवा कर दिल्ली पहुंचवाया करते थे।

मिठाइयों के वह ग़ज़ब के शौक़ीन थे। उनके पुराने मित्र ठिठोली करते कि ठंडाई छानने के बाद भूख खुलना स्वाभाविक है और मीठा खाते रहने का मन करने लगता है।

बचपन और लड़कपन ग्वालियर में बिताने के बाद वह विद्यार्थी के रूप में कानपुर में रहे थे। भिंड मुरैना की गज्जक, जले खोए के पेड़े के साथ-साथ ठग्गू के लड्डू और बदनाम क़ुल्फ़ी का चस्का शायद तभी उनको लगा था।

कुछ और पुरानी बातें याद आती हैं। पचास साल पहले मैंने दिल्ली के रामजस कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया था। हॉस्टल के वॉर्डन प्रोफ़ेसर कौल थे। उन्होंने मुझे छोटा भाई मान कर सस्नेह मेरा मार्गदर्शन किया। छात्रों के लिए वह और श्रीमती कौल वत्सल अभिभावक थे।

वाजपेयी जी कौल दंपति के पारिवारिक मित्र थे। जब वह उनके यहाँ होते तो किसी बड़े नेता की मुद्रा में नहीं होते। छात्रों के साथ अनौपचारिक तरीक़े से जो कुछ पकता, वे मिल-बाँट कर खाते-बतियाते और ठहाके लगाते। बाद में रामजस के तत्कालीन छात्र अशोक सैकिया और शक्ति सिंह आईएएस में उत्तीर्ण होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में पहुँचे।

मॉरीशस से आये विजय सिंह माखन से वाजपेयी जी काफ़ी स्नेह रखते थे। उसके साथ उस द्वीप के प्रवासी भारतीय भोजन की चर्चा अकसर होती थी। मणिलाल त्रिपाठी ओडिशा से आये जो बाद में विदेश सेवा में नियुक्त हुए। उसके साथ छेनापूड को लेकर छेड़ चलती तो कभी-कभार कमला नगर के छोले भटूरों, पुरानी दिल्ली की चाट के चटकारे लिए जाते। हॉस्टल मेस के खाने की गुणवत्ता चखने से उन्हें परहेज़ नहीं था।

लखनऊ और बनारस से कोई पहुँचता तो वह खाने-पीने की कोई सौग़ात उनके लिए लाना न भूलता। जो कुछ हाथ लगता उसे मिल-बाँट कर खाने में ही उन्हें रस आता था। आज जब उनकी स्मृति शेष है तब यह कसक भी महसूस होती है कि आज खान-पान को लेकर कितनी आशंकाएँ हमें भयभीत कर रही हैं और कैसे अपनी बहुलवादी विरासत का क्षय हम चुपचाप देख रहे हैं।

ज़ुबान बंद रखने का वक़्त नहीं-आख़िर ज़ायका भी ज़ुबान पर ही चढ़ता है। हमारी भारतीय पहचान का अभिन्न अंग भाषाओं की विविधता नहीं बल्कि खान-पान की विविधता का सह-अस्तित्व है।

वाजपेयी जी का खाने पीने का शौक़ मेरी समझ में पेटू भोजन सरीखा नहीं था बल्कि संवेदनशील पारखी कला, रसिक वाला और हिंदुस्तान की समन्वयात्मक इंद्रधनुषी संस्कृति का प्रतिबिंबित था। सराहनीय और अनुकरणीय।

आपको अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता “जीवन बीत चला” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

Check Also

सारे जहां से अच्छा - मुहम्मद इक़बाल

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा: मुहम्मद इक़बाल

This great poem was written by Allama Muhammad Iqbal, a great poet-philosopher and active political …

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *