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जयद्रथ वध: राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त

जयद्रथ वध: राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त

Jayadrath Vadh is a famous Epic written by the Rashtra Kavi Maithili Sharan Gupt, and tells the story in Mahabharata of the killing of Jayadrath the Kaurava by Arjuna, the Pandava Warrior. In the excerpt given below, Abhimanyu, the 16 year old son of Arjuna is bent upon tackling a specially tricky Kaurav army formation (Chakraviyuh) that he alone can do in the absence of his father Arjuna who is pre-occupied with a battle elsewhere. When Abhimanyu tells about his resolve to his wife Uttara, she is shaken as she is apprehensive that her husband could be killed in this particular battle. She pleads with her husband not to go for this battle. Her pleading and Abhimanyu’s reply are given in the excerpt given below.

मैथिली शरण गुप्त जी के काव्य में मानव-जीवन की प्रायः सभी अवस्थाओं एवं परिस्थितियों का वर्णन हुआ है। अतः इनकी रचनाओं में सभी रसों के उदाहरण मिलते हैं। प्रबन्ध काव्य लिखने में गुप्त जी को सर्वाधिक सफलता प्राप्त हुई है। मैथिली शरण गुप्त जी की प्रसिद्ध काव्य-रचनाएँ-साकेत,यशोधरा,द्वापर,सिद्धराज, पंचवटी, जयद्रथ-वध, भारत-भारती, आदि हैं। भारत के राष्ट्रीय उत्थान में भारत-भारती का योगदान अमिट है।

जयद्रथ वध: महाभारत के योद्धा जयद्रथ के वध का चित्रण

“मैं यह नहीं कहती कि रिपु से जीवितेश लड़ें नहीं,
तेजस्वियों की आयु भी देखी भला जाती कहीं ?
मैं जानती हूँ नाथ! यह मैं मानती भी हूँ तथा–
उपकरण से क्या शक्ति में हा सिद्धि रहती सर्वथा॥”

“क्षत्राणियों के अर्थ भी सबसे बड़ा गौरव यही–
सज्जित करें पति–पुत्र को रण के लिए जो आप ही।
जो वीर पति के कीर्ति–पथ में विघ्न–बाधा डालतीं–
होकर सती भी वह कहाँ कर्त्तव्य अपना पालतीं?

अपशकुन आज परन्तु मुझको हो रहे सच जानिए,
मत जाइए सम्प्रति समर में प्रर्थना यह मानिए।
जाने न दूँगी आज मैं प्रियतम तुम्हें संग्राम में,
उठती बुरी है भावनाएँ हाय! इस हृदाम में।

है आज कैसा दिन न जाने, देव–गण अनुकूल हों;
रक्षा करें प्रभु मार्ग में जो शूल हों वे फूल हों।
कुछ राज–पाट न चाहिए, पाऊँ न क्यों मैं त्रास ही;
हे उत्तरा के धन! रहो तुम उत्तरा के पास ही॥

कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गये,
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गये पंकज नये।
निज प्राणपति के स्कन्ध पर रखकर वदन वह सुन्दरी,
करने लगी फिर प्रार्थना नाना प्रकार व्यथा–भरी॥

यों देखकर व्याकुल प्रिया को सान्त्वना देता हुआ,
उसका मनोहर पाणि–पल्लव हाथ में लेता हुआ,
करता हुआ वारण उसे दुर्भावना की भीति से,
कहने लगा अभिमन्यु यों प्यारे वचन अति प्रीति से–

“जीवनमयी, सुखदायिनी, प्राणाधिके, प्राणप्रिये!
कातर तुम्हें क्या चित्त में इस भाँति होना चाहिये ?
हो शान्त सोचो तो भला क्या योग्य है तुमको यही।
हा! हा! तुम्हारी विकलता जाती नहीं मुझसे सही॥

वीर–स्नुषा1 तुम वीर–रमणी, वीर–गर्भा हो तथा,
आश्चर्य, जो मम रण–गमन से हो तुम्हें फिर भी व्यथा!
हो जानती बातें सभी कहना हमारा व्यर्थ है,
बदला न लेना शत्रु से कैसा अधर्म अनर्थ है ?

इन कौरवों ने हा! हमें संताप कैसे हैं दिए,
सब सुन चुकी हो तुम इन्होंने पाप जैसे हैं किए!
फिर भी इन्हें मारे बिना हम लोग यदि जाते रहें,
तो सोच लो संसार भर के वीर हमसे क्या कहें ?

जिस पर हृदय का प्रेम होता सत्य और समग्र है,
उसके लिए चिन्तित तथा रहता सदा वह व्यग्र है।
होता इसी से है तुम्हारा चित्त चंचल हे प्रिये!
यह सोचकर सो अब तुम्हें शंकित न होना चाहिए—

रण में विजय पाकर प्रिये! मैं शीघ्र आऊँगा यहाँ,
चिन्तित न हो मन में, न तुमको भूल जाऊँगा वहाँ!
देखो, भला भगवान ही जब हैं हमारे पक्ष में,
जीवित रहेगा कौन फिर आकर हमारे लक्ष1 में ?”

यों धैर्य देकर उत्तरा को, हो विदा सद्भाव से!
वीराग्रणी अभिमन्यु पहुँचा सैन्य में अति चाव से।
स्वर्गीय साहस देख उसका सौ गुने उत्साह से,
भरने लगे सब सैनिकों के हृदय हर्ष–प्रवाह से॥

फिर पाण्डवों के मध्य में अति भव्य निज रथ पर चढ़ा,
रणभूमि में रिपु सैन्य सम्मुख वह सुभद्रा सुत बढ़ा।
पहले समय में ज्यों सुरों के मध्य में सजकर भले;
थे तारकासुर मारने गिरिनन्दिनी–नन्दन चले॥

वाचक! विचारो तो जरा उस समय की अद्भुत छटा
कैसी अलौकिक घिर रही है शूरवीरों की घटा।
दुर्भेद्य चक्रव्यूह सम्मुख धार्तराष्ट्र2 रचे खड़े,
अभिमन्यु उसके भेदने को हो रहे आतुर बड़े॥

तत्काल ही दोनों दलों में घोर रण होने लगा,
प्रत्येक पल में भूमि पर वर वीर–गण सोने लगा!
रोने लगीं मानों दिशाएँ हो पूर्ण रण–घोष से,
करने लगे आघात सम्मुख शूर–सैनिक रोष से॥

1. निशान, 2. दुर्योधनादिक धृतराष्ट्र के पुत्र।

इस युद्ध में सौभद्र1 ने जो की प्रदर्शित वीरता,
अनुमान से आती नहीं उसकी अगम गम्भीरता।
जिस धीरता से शत्रुओं का सामना उसने किया,
असमर्थ हो उसके कथन में मौन वाणी ले लिया।
करता हुआ कर–निकर2 दुर्द्धर सृष्टि के संहार को,
कल्पान्त में सन्तप्त करता सूर्य ज्यों संसार को–
सब ओर त्यों ही छोड़कर जिन प्रखरतर शर–जाल को,
करने लगा वह वीर व्याकुल शत्रु–सैन्य विशाल को!
शर खींच उसने तूण3 से कब किधर सन्धाना उन्हें;
बस बिद्ध होकर ही विपक्षी वृन्द ने जाना उन्हें।
कोदण्ड4 कुण्डल–तुल्य ही उसका वहाँ देखा गया,
अविराम रण करता हुआ वह राम सम लेखा गया।
कटने लगे अगणित भटों के रण्ड–मुण्ड जहाँ तहाँ,
गिरने लगे कटकर तथा कर–पद सहस्त्रों के वहाँ।
केवल कलाई ही कौतूहल–वश किसी की काट दी,
क्षण मात्र में ही अरिगणों से भूमि उसने पाट दी।
करता हुआ वध वैरियों का वैर शोधन के लिए,
रण–मध्य वह फिरने लगा अति दिव्यद्युति धारण किए।
उस काल सूत सुमित्र के रथ हाँकने की रीति से,
देखा गया वह एक ही दस–बीस–सा अति भीति से।
उस काल जिस जिस ओर वह संग्राम करने को क्या,
भगते हुए अरि–वृन्द से मैदान खाली हो गया!
रथ–पथ कहीं भी रुद्ध उसका दृष्टि में आया नहीं;
सम्मुख हुआ जो वीर वह मारा गया तत्क्षण वहीं।

1. अभिमन्यु 2. कर=किरण, निकर=समूह 3. तरकस, 4. धनुष।

ज्यों भेद जाता भानु का कर अन्धकार–समूह को,
वह पार्थ–नन्दन घुस गया त्यों भेद चक्रव्यूह को।
थे वीर लाखों पर किसी से गति न उसकी रुक सकी,
सब शत्रुओं की शक्ति उसके सामने सहसा थकी॥

पर साथ भी उसके न कोई जा सका निज शक्ति से,
था द्वार रक्षक नृप जयद्रथ सबल शिव की शक्ति से।
अर्जुन बिना उसको न कोई जीत सकता था कहीं,
थे किन्तु उस संग्राम में भवितव्यता–वश वे नहीं॥

तब विदित कर्ण–कनिष्ठ भ्राता बाण बरसा कर बड़े,
“रे खल! खड़ा रह” वचन यों कहने लगा उससे कड़े।
अभिमन्यु ने उसको श्रवण कर प्रथम कुछ हँसभर दिया।
फिर एक शर से शीघ्र उसका शीश खण्डित कर दिया।
यों देख मरते निज अनुज को कर्ण अति क्षोभित हुआ,
सन्तप्त स्वर्ण–समान उसका वर्ण अति शोभित हुआ,
सौभद्र पर सौ बाण छोड़े जो अतीव कराल थे,
अतः! बाण थे वे या भयंकर पक्षधारी व्याल थे॥

अर्जुन–तनय ने देख उनको वेग से आते हुए,
खण्डित किया झट बीच में ही धैर्य दिखलाते हुए,
फिर हस्तलाघव से उसी क्षण काट के रिपु चाप को,
रथ, सूत्र, रक्षक नष्ट कर सौंपा उसे सन्ताप को।
यों कर्म को हारा समझकर चित्त में अति क्रुद्ध हो,
दुर्योधनात्मक वीर लक्ष्मण या गया फिर युद्ध को।
सम्मुख उसे अवलोक कर अभिमन्यु यों कहने लगा,
मानो भयंकर सिन्धु–नद तोड़कर बहने लगा–
“तुम हो हमारे बन्धु इससे हम जताते हैं तुम्हें,
मत जानियो तुम यह कि हम निर्बल बताते हैं तुम्हें,
अब इस समय तुम निज जनों को एक बार निहार लो,
यम–धाम में ही अन्यथा होगा मिलाप विचार लो।”
उस वीर को, सुनकर वचन ये, लग गई बस आग–सी,
हो क्रुद्ध उसने शक्ति छोड़ी एक निष्ठुर नाग सी॥

अभिमन्यु ने उसको विफल कर ‘पाण्डवों की जय’ कही
फिर शर चढ़ाया एक जिसमें ज्योति–सी थी जग रही।
उस अर्धचन्द्राकार शर ने छूट कर कोदण्ड से,
छेदन किया रिपु–कण्ठ तत्क्षण फलक1 धार प्रचण्ड से,
होता हुआ इस भाँति भासित शीश उनका गिर पड़ा,
होता प्रकाशित टूट कर नक्षत्र ज्यों नभ में बड़ा॥

तत्काल हाहाकार–युत–रिपु–पक्ष में दुख–सा छा गया।
फिर दुष्ट दुःशासन समर में शीघ्र सम्मुख आ गया।
अभिमन्यु उसको देखते ही क्रोध से जलने लगा,
निश्वास बारम्बार उसका उष्णतर चलने लगा।
रे रे नराधम नारकी! तू था बता अब तक कहाँ ?
मैं खोजता फिरता तुझे सब ओर कब से कहूँ यहाँ।
यह देख, मेरा बाण तेरे प्राण–नाश निमित्त है,
तैयार हो, तेरे अघों का आज प्रायश्चित है।
अब सैनिकों के सामने ही आज वध करके तुझे,
संसार में माता–पिता से है उऋण होना मुझे।
मेरे करों से अब तुझे कोई बचा सकता नहीं।
पर देखना, रणभूमि से तू भाग मत जाना कहीं।

1. गाँसी।

कह यों वचन अभिमन्यु ने छोड़ा धनुष से बाण को,
रिपु भाल में वह घुस गया झट भेद शीर्ष–त्राण1 को,
तब रक्त से भीगा हुआ वह गिर पड़ा पाकर व्यथा,
सन्ध्या समय पश्चिम–जलधि में अरुण रवि गिरता यथा
मूर्च्छित समझ उसको समर से ले गया रथ सारथी,
लड़ने लगा तब नृप बृहद्बल उचित नाम महारथी।
कर खेल क्रीड़ासक्त हरि2 ज्यों मारता करि3 को कभी,
मारा उसे अभिमन्यु ने त्यों छिन्न करके तनु सभी॥

उस एक ही अभिमन्यु से यों युद्ध जिस जिस ने किया।
मारा गया अथवा समर से विमुख होकर जिया।
जिस भाँति विद्युतद्दाम से होती सुशोभित घन–घटा,
सर्वत्र छिटकाने लगा वह समर में शस्त्रच्छटा॥

तब कर्ण द्रोणाचार्य से साश्चर्य यों कहने लगा–
“आचार्य देखो तो नया यह सिंह सोते से जगा।
रघुवर–विशिख से सिन्धु सम सब सैन्य इससे व्यस्त हैं!
यह पार्थ–नन्दन पार्थ से भी धीर वीर प्रशस्त है!
होना विमुख संग्राम से है पाप वीरों को महा,
यह सोचकर ही इस समय ठहरा हुआ हूँ मैं यहाँ।
जैसे बने अब मारना ही योग्य इसको है यहीं,
सच जान लीजे अन्यथा निस्तार फिर होगा नहीं।”

वीराग्रणी अभिमन्यु! तुम हो धन्य इस संसार में,
शत्रु भी यों मग्न हों जिसके शौर्य–पारावार में,
होता तुम्हारे निकट निष्प्रभ तेज शशि का, सूर का,
करते विपक्षी भी सदा गुण–गान सच्चे सूर का।

1. सिर का कवच, 2. सिंह, 3. हाथी।

मैथिली शरण गुप्त (राष्ट्र कवि)

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