एक सीढ़ी और: कुंवर बेचैन

एक सीढ़ी और: कुंवर बेचैन

एक सीढ़ी और चढ़ आया
समय इस साल
जाने छत कहाँ है।

प्राण तो हैं प्राण
जिनको देह–धनु से छूटना है,
जिंदगी – उपवास
जिसको शाम के क्षण टूटना है,
हम समय के हाथ से
छूटे हुए रूमाल,
जाने छत कहाँ है।

यह सुबह, यह शाम
बुझते दीपकों की व्यस्त आदत
और वे दिन–रात
कोने से फटे जख्मी हुए ख़त
यह हथेली भी हुई है
मकड़ियों का जाल
जाने छत कहाँ है।

कुंवर बेचैन

आपको कुंवर बेचैन जी की यह कविता “एक सीढ़ी और” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

यदि आपके पास Hindi / English में कोई poem, article, story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें। हमारी Id है: submission@4to40.com. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ publish करेंगे। धन्यवाद!

Check Also

Dakshinayana Sankranti - Hindu Festival

Dakshinayana Sankranti Information, Fact, Ritual

Legends have it that Gods go to sleep during the Dakshinayana period. As the sun …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *