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एक बरस बीत गया - अटल बिहारी वाजपेयी

एक बरस बीत गया: अटल जी की नए साल पर कविता

Another lovely poem by Atal Ji. One more year has passed by and one can just observe and feel inside the emptiness of this uninterrupted yet repetitive stream of passage of time…

एक बरस बीत गया: अटल बिहारी वाजपेयी

झुलसाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अन्तर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया।

सींकचों में सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अंबर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया।

पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया।

अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में कहां जाता है कि कई बार वो बेहद मुश्किल हालात या कठिन सवाल को सिर्फ अपने ठहाकों से टालने महारत रखते थे। कई बार तो उसके ऐसे जवाब देते थे कि विषय ही बदल जाता था और गंभीर विषय को भी वो बेहद हल्का-फुल्का और मजाक के माहौल में बदल देते थे। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य और अटल जी का सानिध्य पाने वाले आनंद अवस्थी ने बताया,’अटल जी दोनों कलाओं में माहिर थे। वो बेहद कठिन या अप्रिय लगने वाले सवाल का हल्का-फुल्का या मजाकिया जवाब देते थे और कई बार मजाक मजाक में बेहद गंभीर बात कह जाते थे।’

ऐसी ही एक घटना का जिक्र करते हुए आरएसएस के प्रचारक रहे और अभी दीनदयाल शोध संस्थान में कार्यरत संतोष मिश्र ने बताया, ‘अटल जी जब प्रधानमंत्री थे तो चित्रकूट में नाना जी देशमुख द्वारा शुरू किए गए ग्राम विकास के कार्यक्रमों को देखने आए। इस दौरान कक्षा पांच की एक आदिवासी बच्ची ने उनसे पूछ लिया कि आपने शादी क्यों नहीं की।’

बच्चों का साथ था पसंद

उन्होंने आगे बताया, ‘इस पर अटल जी ने जोर का ठहाका लगाया। उन्हें हंसते हुए देखकर सभी ने राहत की सांस ली। फिर अटल जी ने उस बच्ची ने कहा ‘कोई मिला ही नहीं।’ उनके ऐसा कहने पर सभी फिर हंस पड़े।’ उन्होंने बताया कि वो बच्चों को बहुत प्यार करते थे, और जब भी किसी के घर जाते तो बड़े लोगों से ज्यादा बच्चों से बाते करते थे। संतोष मिश्र ने कहा, ‘हम लोग बचपन में आरएसएस के एक शिविर में भाग ले रहे थे। अटल जी वहां बौद्धिक देने आए थे। वो करीब एक घंटे तक बोले और उसके बाद करीब आधे घंटे तक हम लोगों के बीच में आकर बातें करते रहे। इस दौरान पढ़ाई लिखाई की बातें की और हंसी मजाक भी खूब हुआ।’

आनंद अवस्थी बताते हैं, ‘अटल जी जैसा सरल और सहज नेता नहीं हुआ। उनसे मिलना बहुत आसान था। बस उनके पास जाकर बैठ जाइए, इतना आसान। उनके साथ कोई तामझाम नहीं था। एक बार वो उन्नाव के अचलगंज में एक विद्यालय के शिलान्यास के लिए आए। भाजपा की एक नेता उन्हें अपने घर चाय के लिए ले जाना चाहती थीं, लेकिन प्रोटोकॉल के चलते मना कर दिया गया। जब ये बात अटल जी को पता चली, तो वो तैयार हो गए। इतना सरल व्यवहार था उनका।’

उन्होंने बताया कि अटल जी को मिठाई बहुत पसंद थी और खाने के बाद अगर मिठाई नहीं दी गई तो वो खुद मिठाई मांग लेते थे।

आपको अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता “एक बरस बीत गया” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

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