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धर्म है: गोपाल दास नीरज

धर्म है: गोपाल दास नीरज की प्रेरणादायक हिंदी कविता

Here is a lovely poem of Gopal Das Neeraj that tells us that challenges must be met head-on and are not to be avoided.

जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना
उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है।

जिस वक्त जीना गैर मुमकिन सा लगे
उस वक्त जीना फ़र्ज है इन्सान का
लाज़िम लहर के साथ है तब खेलना
जब हो समुन्दर पे नशा तूफ़ान का
जिस वायु का दीपक बुझना ध्येय हो
उस वायु में दीपक जलाना धर्म है।

हो नहीं मंज़िल कहीं जिस राह की
उस राह चलना चाहिये इंसान को
जिस दर्द से सारी उमर रोते कटे
वह दर्द पाना है जरूरी प्यार को
जिस चाह का हस्ती मिटाना नाम है
उस चाह पर हस्ती मिटाना धर्म है।

आदत पड़ी हो भूल जाने की जिसे
हरदम उसी का नाम हो हर सांस पर
उसकी ख़बर में ही सफ़र सारा कटे
जो हर नज़र से हर तरह हो बेखबर
जिस आंख का आंखें चुराना काम हो
उस आंख से आंखें मिलाना धर्म है।

जब हाथ से टूटे न अपनी हथकड़ी
तब मांग लो ताकत स्वयं जंज़ीर से
जिस दम न थमती हो नयन सावन झड़ी
उस दम हंसी ले लो किसी तस्वीर से
जब गीत गाना गुनगुनाना जुर्म हो
तब गीत गाना गुनगुनाना धर्म है।

गोपाल दास नीरज

Gopaldas Saxena ‘Neeraj (popularly known as Niraj or Neeraj; 4 January 1925 – 18 July 2018) was an Indian poet and author of Hindi literature. He was also a famous poet of Hindi Kavi sammelan. He was born in the village of Puravali near Mahewa of Etawah in Uttar Pradesh, India on 4 January 1925. He wrote under the pen name “Neeraj”. His style is easy to understand and considered to be high quality Hindi literature. He was awarded Padma Shri in 1991 and Padma Bhushan in 2007.

Besides writing, he earned his living teaching in a college and was a Professor of Hindi Literature in Dharma Samaj College, Aligarh. Several of his poems and songs have been used in Hindi movies and are considered famous. He wrote songs for several Hindi Movies and attained a unique position as a songwriter who wrote with equal facility in both Hindi and Urdu.

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One comment

  1. Please send me summery of this poem.

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