बंदर आया - अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

बंदर आया: अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

Here is a simple poem on monkeys for children by the well known poet Ayodhya Singh Hariaudh. The era when madaris would go around with their damroo and monkeys dressed in colorful clothes and put up a street show of Bandar and bandaria, are now gone. Kids now do not get opportunity to see the performance of bandar on cue from the madari. This poem however describes the scene very well.

बंदर आया: अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

देखो लड़को, बंदर आया।
एक मदारी उसको लाया॥

कुछ है उसका ढंग निराला।
कानों में है उसके बाला॥

फटे पुराने रंग बिरंगे।
कपड़े उसके हैं बेढंगे॥

मुँह डरावना आँखे छोटी।
लंबी दुम थोड़ी सी मोटी॥

भौंह कभी वह है मटकाता।
आँखों को है कभी नचाता॥

ऐसा कभी किलकिलाता है।
जैसे अभी काट खाता है॥

दाँतों को है कभी दिखाता।
कूद फाँद है कभी मचाता॥

कभी घुड़कता है मुँह बा कर।
सब लोगों को बहुत डराकर॥

कभी छड़ी लेकर है चलता।
है वह यों ही कभी मचलता॥

है सलाम को हाथ उठाता।
पेट लेट कर है दिखलाता॥

ठुमक ठुमक कर कभी नाचता।
कभी कभी है टके माँगता॥

सिखलाता है उसे मदारी।
जो जो बातें बारी बारी॥

वह सब बातें वह करता है।
सदा उसी का दम भरता है॥

देखो बंदर सिखलाने से।
कहने सुनने समझाने से॥

बातें बहुत सीख जाता है।
कई काम कर दिखलाता है॥

फिर लड़को, तुम मन देने पर।
भला क्या नहीं सकते हो कर॥

बनों आदमी तुम पढ़ लिखकर।
नहीं एक तुम भी हो बंदर॥

∼ ‘बंदर आया’ Poem by अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (जन्म- 15 अप्रैल, 1865, मृत्यु- 16 मार्च, 1947) का नाम खड़ी बोली को काव्य भाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने वाले कवियों में बहुत आदर से लिया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में 1890 ई. के आस-पास अयोध्या सिंह उपाध्याय ने साहित्य सेवा के क्षेत्र में पदार्पण किया।

अयोध्या सिंह उपाध्याय का जन्म उत्तर प्रदेश के ज़िला आजमगढ़ के निज़ामाबाद नामक स्थान में सन् 1865 ई. में हुआ था। हरिऔध के पिता का नाम भोलासिंह और माता का नाम रुक्मणि देवी था। अस्वस्थता के कारण हरिऔध जी का विद्यालय में पठन-पाठन न हो सका अतः इन्होंने घर पर ही उर्दू, संस्कृत, फ़ारसी, बांग्ला एवं अंग्रेज़ी का अध्ययन किया। 1883 में ये निज़ामाबाद के मिडिल स्कूल के हेडमास्टर हो गए। 1890 में क़ानूनगो की परीक्षा पास करने के बाद आप क़ानून गो बन गए। सन् 1923 में पद से अवकाश लेने पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने।

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