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रंगों के त्यौहार पर बाल-कविता: आई होली

रंगों के त्यौहार पर बाल-कविता: आई होली

देखो इतराती बलखाती होली आ गयी
युवतियों का योवन क्या,

प्रौढ़जनों में भी फागुन की मस्ती छा गई
देखों डूबती, इतराती होली आ गई।

कहीं होती है गुलकारी तो
कहीं बरसती है पिचकारी,

कहीं तबले खड़कते है
कहीं घुंगरू खनकते हैं।
कहीं रंग दमकते हैं
तो कहीं भांग छनती हैं,

कपडों पैर रंग छलक पड़ते हैं
लाल गालों पर दांत दमक पड़ते हैं ।

कहीं बजती है मृदंग
तो कहीं बजती है चंग,
पांव थिरकते हैं जब चढ़ जाती है भंग।

~ प्रभा पारीक

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