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Tulsi Vivah Festival Information For Household

Tulsi Vivah Festival Information For Household

Tulsi Vivah is celebrated on the next day of Karthik Ekadashi. On this day Tulsi is married to Saaligram.

In 2018, it will be celebrated on November 20 (Tuesday).

The tulsi plant is held sacred by the Hindus as it is regarded to be an incarnation of Mahalaxmi who was born as Vrinda. Tulsi was married to demon king Jalandhar. She prayed to Lord Vishnu that her demon husband should be protected, with the result no God was able to harm him. However on the request of the other Gods, Shri Vishnu took the form of Jalandhar and stayed with the unsuspecting Tulsi. When the truth emerged after Jalandhar’s death, Vrinda cursed Lord Vishnu and turned him to stone (Saaligram) and collapsed. From her body emerged the tulsi plant. That is why Vishnu puia is considered incomplete without tulsi leaves.

The very name Tulsi, that which cannot be compared, the “incomparable one”, has spiritually uplifting qualities. Tulsi has been found to possess extraordinary powers of healing.

तुलसी विवाह

तुलसी विवाह

तुलसी विवाह एक बहुत ही पवित्र और फलदाई त्योहार है। इस दिन तुलसी के पौधे की शालीग्राम (पत्थर) से शादी की जाती है। ये शादी भी अन्य शादियों की तरह मनाई जाती है। नए नए कपड़े डाले जाते हैं, मंडप सजता है, फेरे होते हैं और दावत भी दी जाती है। दरअसल चार महीने तक देवता सोए हुए होते हैं और इस दौरान सिर्फ पूजा पाठ ही होता है कोई शुभ कार्य नहीं होता है। देव उठनी के दिन सभी जागते हैं और मुहुर्त भी खुल जाते हैं। देवताओं के उठने के बाद पहला शुभ कार्य होता है तुलसी विवाह। तुलसी विवाह कार्तिक एकादशी के अगले दिन होता है।

कैसे होता है विवाह?

विवाह में सब कुछ आम विवाह की तरह ही होता है। बस दुल्हन की जगह होता है तुलसी का पौधा और दुल्हे की जगह शालीग्राम। शालीग्राम असल में विष्णु भगवान हैं। घर सजाया जाता है। मंडप लगता है। सबसे पहले तुलसी के पौधे को लाल चुनरी ओढ़ाई जाती है। 16 श्रंगार का सामान चढ़ाया जाता है। अग्रि जलाई जाती है, शालिग्राम और तुलसी को हाथ में पकड़ कर फेरे दिलाए जाते हैं। विवाह के बाद प्रीतिभोज का आयोजन किया जाता है। विवाह में महिलाएं विवाह गीत और भजन गाती हैं।

कथा

कहा जाता है कि बहुत सदियों पहले एक जालंधर नाम का असुर था। वो हमेशा ही देवताओं को हरा देता। हर तरफ उसने क्रूरता फैला रखी थी। उसकी ताकत के पीछे थी उसकी पत्नी वृंदा और उसका पतिव्रता धर्म। जालंधर से परेशान देवताओं ने विष्णु से गुहार लगाई। तब विष्णु ने जालंधर की पत्नी का सतीत्व नष्ट कर दिया। सतीत्व खत्म होते ही जालंधर असुर युद्ध में मारा गया। वृंदा ने विष्णु को श्राप दिया कि तुम अब पत्थर के बनोगे। विष्णु बोले, हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा।

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