Poems In Hindi

बच्चों की हिन्दी कविताएं — 4to40 का हिन्दी कविताओ का संग्रह | Hindi Poems for Kids — A collection of Hindi poems for children. पढ़िए कुछ मजेदार, चुलबुली, नन्ही और बड़ी हिंदी कविताएँ. इस संग्रह में आप को बच्चो और बड़ो के लिए ढेर सारी कविताएँ मिलेंगी.

कलाकार और सिपाही – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

वे तो पागल थे जो सत्य, शिव, सुंदर की खोज में अपने–अपने सपने लिये नदियों, पहाड़ों, बियाबानों, सुनसानों मे फटे–हाल भूखे प्यासे, टकराते फिरते थे, अपने से जूझते थे, आत्मा की आज्ञा पर मानवता के लिये, शिलाएँ, चट्टानें, पर्वत काट–काट कर मूर्तियाँ, मन्दिर, और गुफाएँ बनाते थे। किंतु ऐ दोस्त! इनको मैं क्या कहूँ, जो मौत की खोज में अपनी–अपनी …

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जब जब सिर उठाया – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

जब-जब सिर उठाया अपनी चौखट से टकराया। मस्तक पर लगी चोट, मन में उठी कचोट, अपनी ही भूल पर मैं, बार-बार पछताया। जब-जब सिर उठाया अपनी चौखट से टकराया। दरवाजे घट गए या मैं ही बडा हो गया, दर्द के क्षणों में कुछ समझ नहीं पाया। जब-जब सिर उठाया अपनी चौखट से टकराया। “शीश झुका आओ” बोला बाहर का आसमान, …

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साकेत: दशरथ का श्राद्ध, राम भारत संवाद – मैथिली शरण गुप्त

उस ओर पिता के भक्ति-भाव से भरके, अपने हाथों उपकरण इकट्ठे करके, प्रभु ने मुनियों के मध्य श्राद्ध-विधि साधी, ज्यों दण्ड चुकावे आप अवश अपराधी। पाकर पुत्रों में अटल प्रेम अघटित-सा, पितुरात्मा का परितोष हुआ प्रकटित-सा। हो गई होम की शिखा समुज्ज्वल दूनी, मन्दानिल में मिल खिलीं धूप की धूनी। अपना आमंत्रित अतिथि मानकर सबको, पहले परोस परितृप्ति-दान कर सबको, …

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साकेत: अष्टम सर्ग – मैथिली शरण गुप्त

तरु–तले विराजे हुए, शिला के ऊपर, कुछ टिके, –घनुष की कोटि टेक कर भू पर, निज लक्ष–सिद्धि–सी, तनिक घूमकर तिरछे, जो सींच रहीं थी पर्णकुटी के बिरछे। उन सीता को, निज मूर्तिमती माया को, प्रणयप्राणा को और कान्तकाया को, यों देख रहे थे राम अटल अनुरागी, योगी के आगे अलख–जोति ज्यों जागी। अंचल–पट कटि में खोंस, कछोटा मारे, सीता माता …

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साकेत: भरत का पादुका मांगना – मैथिली शरण गुप्त

“हे राघवेंद्र यह दास सदा अनुयायी‚ है बड़ी दण्ड से दया अन्त में न्यायी! हे देव भार के लिये नहीं रोता हूं‚ इन चरणों पर ही मैं अधीर होता हूं। प्रिय रहा तुम्हें यह दयाघृष्टलक्षण तो‚ कर लेंगी प्रभु–पादुका राज्य–रक्षण तो। तो जैसी आज्ञा आर्य सुखी हों बन में‚ जूझेगा दुख से दास उदास भवन में। बस‚ मिले पादुका मुझे‚ …

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साकेत: राम का उत्तर – मैथिली शरण गुप्त

“हा मातः‚ मुझको करो न यों अपराधी‚ मैं सुन न सकूंगा बात और अब आधी। कहती हो तुम क्या अन्य तुल्य यह वाणी‚ क्या राम तुम्हारा पुत्र नहीं वह मानी? अब तो आज्ञा की अम्ब तुम्हारी बारी‚ प्रस्तुत हूं मैं भी धर्म धनुर्धृतिधारी। जननी ने मुझको जना‚ तुम्हीं ने पाला‚ अपने सांचे में आप यत्न कर डाला। सबके ऊपर आदेश …

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मन रे तू काहे न धीर धरे – साहिर लुधियानवी

मन रे तू काहे न धीर धरे वो निर्मोही मोह न जाने जिनका मोह करे इस जीवन की चढ़ती गिरती धूप को किसने बांधा रंग पे किसने पहरे डाले रूप को किसने बांधा काहे ये जतन करे मन रे तू काहे न धीर धरे उतना ही उपकार समझ कोई– जितना साथ निभा दे जनम मरण का मेल है सपना यह …

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सखि वे मुझसे कहकर जाते – मैथिली शरण गुप्त

सखि, वे मुझसे कहकर जाते, कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते? मुझको बहुत उन्होंने माना फिर भी क्या पूरा पहचाना? मैंने मुख्य उसी को जाना जो वे मन में लाते। सखि, वे मुझसे कहकर जाते। स्वयं सुसज्जित करके क्षण में, प्रियतम को, प्राणों के पण में, हमीं भेज देती हैं रण में– क्षात्र–धर्म के नाते। सखि, वे …

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रश्मिरथी – रामधारी सिंह दिनकर

रश्मिरथी, जिसका अर्थ “सूर्य का सारथी” है, हिन्दी के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित प्रसिद्ध खण्डकाव्य है। इसमें ७ सर्ग हैं। रश्मिरथी अर्थात वह व्यक्ति, जिसका रथ रश्मि अर्थात सूर्य की किरणों का हो। इस काव्य में रश्मिरथी नाम कर्ण का है क्योंकि उसका चरित्र सूर्य के समान प्रकाशमान है। कर्ण महाभारत महाकाव्य का अत्यन्त यशस्वी पात्र है। …

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तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन – जयशंकर प्रसाद

तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन। विकल हो कर नित्य चंचल खोजती जब नींद के पल चेतना थक–सी रही तब, मैं मलय की वात रे मन। चिर विषाद विलीन मन की, इस व्यथा के तिमिर वन की मैं उषा–सी ज्योति-रेखा, कुसुम विकसित प्रात रे मन। जहाँ मरू–ज्वाला धधकती, चातकी कन को तरसती, उन्हीं जीवन घाटियों की, मैं सरस बरसात …

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