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Poems For Kids

Poetry for children: Our large assortment of poems for children include evergreen classics as well as new poems on a variety of themes. You will find original juvenile poetry about trees, animals, parties, school, friendship and many more subjects. We have short poems, long poems, funny poems, inspirational poems, poems about environment, poems you can recite

न्यूयार्क की एक शाम – गिरिजा कुमार माथुर

देश काल तजकर मैं आया भूमि सिंधु के पार सलोनी उस मिट्टी का परस छुट गया जैसे तेरा प्यार सलोनी। दुनिया एक मिट गई, टूटे नया खिलौना ज्यों मिट्टी का आँसू की सी बूँद बन गया मोती का संसार, सलोनी। स्याह सिंधु की इस रेखा पर ये तिलिस्म–दुनिया झिलमिल है हुमक उमगती याद फेन–सी छाती में हर बार, सलोनी। सभी …

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मेरे सपने बहुत नहीं हैं – गिरिजा कुमार माथुर

मेरे सपने बहुत नहीं हैं छोटी सी अपनी दुनिया हो, दो उजले–उजले से कमरे जगने को–सोने को, मोती सी हों चुनी किताबें शीतल जल से भरे सुनहले प्यालों जैसी ठण्डी खिड़की से बाहर धीरे हँसती हो तितली–सी रंगीन बगीची छोटा लॉन स्वीट–पी जैसा, मौलसरी की बिखरी छितरी छाँहों डूबा ­­ हम हों, वे हों काव्य और संगीत–सिंधु में डूबे–डूबे प्यार …

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कौन थकान हरे जीवन की – गिरिजा कुमार माथुर

कौन थकान हरे जीवन की? बीत गया संगीत प्यार का‚ रूठ गई कविता भी मन की। वंशी में अब नींद भरी है‚ स्वर पर पीत सांझ उतरी है बुझती जाती गूंज आखिरी — इस उदास बन पथ के ऊपर पतझर की छाया गहरी है‚ अब सपनों में शेष रह गई सुधियां उस चंदन के बन की। रात हुई पंछी घर …

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घर: दो कविताएं – निदा फ़ाज़ली

अहतियात घर से बाहर जब भी जाओ तो ज्यादा से ज्यादा रात तक लौट आओ जो कई दिन तक ग़ायब रह कर वापस आता है वो उम्र भर पछताता है घर अपनी जगह छोड़ कर चला जाता है। लगाव तुम जहाँ भी रहो उसे घर की तरह सजाते रहो गुलदान में फूल सजाते रहो दीवारों पर रंग चढ़ाते रहो सजे …

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पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला – महादेवी वर्मा

घेर ले छाया प्रमा बन आज कज्जल अश्रुओं में, रिम झिमा ले यह घिरा घन और होंगे नयन सूखे तिल बुझे औ पलक रूखे आर्द्र चितवन में यहां शत विद्युतों में दीप खेला पंथ होने दो अपरिचित, प्राण रहने दो अकेला। अन्य होंगे चरण हारे और हैं जो लौटते, दे शूल को संकल्प सारे दुखव्रती निर्माण उन्मद यह अमरता नापते …

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नींद में सपना बन अज्ञात – महादेवी वर्मा

नींद में सपना बन अज्ञात! गुदगुदा जाते हो जब प्राण, ज्ञात होता हँसने का अर्थ तभी तो पाती हूं यह जान, प्रथम छूकर किरणों की छाँह मुस्कुरातीं कलियाँ क्यों प्रात, समीरण का छूकर चल छोर लोटते क्यों हँस हँस कर पात! प्रथम जब भर आतीं चुप चाप मोतियों से आँँखें नादान आँकती तब आँसू का मोल तभी तो आ जाता …

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मधुर मधुर मेरे दीपक जल – महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल प्रियतम का पथ आलोकित कर! सौरभ फैला विपुल धूप बन मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन! दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल पुलक-पुलक मेरे दीपक जल! तारे शीतल कोमल नूतन माँग रहे तुझसे ज्वाला कण; विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं हाय, न जल पाया तुझमें मिल! सिहर-सिहर मेरे दीपक …

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कहां रहेगी चिड़िया – महादेवी वर्मा

आंधी आई जोर-शोर से डाली टूटी है झकोर से उड़ा घोंसला बेचारी का किससे अपनी बात कहेगी अब यह चिड़िया कहां रहेगी ? घर में पेड़ कहां से लाएं कैसे यह घोंसला बनाएं कैसे फूटे अंडे जोड़ें किससे यह सब बात कहेगी अब यह चिड़िया कहां रहेगी ? ∼ महादेवी वर्मा

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जाग तुझको दूर जाना – महादेवी वर्मा

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले! या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले; आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले! पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना! जाग …

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ज़िन्दगी की शाम – राजीव कृष्ण सक्सेना

कह नहीं सकता समस्याएँ बढ़ी हैं, और या कुछ घटा है सम्मान। बढ़ रही हैं नित निरंतर, सभी सुविधाएं, कमी कुछ भी नहीं है, प्रचुर है धन धान। और दिनचर्या वही है, संतुलित पर हो रहा है रात्रि का भोजन, प्रात का जलपान। घटा है उल्लास, मन का हास, कुछ बाकी नहीं आधे अधूरे काम। और वय कुछ शेष, बैरागी …

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