Poems For Kids

Poetry for children: Our large assortment of poems for children include evergreen classics as well as new poems on a variety of themes. You will find original juvenile poetry about trees, animals, parties, school, friendship and many more subjects. We have short poems, long poems, funny poems, inspirational poems, poems about environment, poems you can recite

कवि का पत्र प्रेमिका को – बालस्वरूप राही

आह, कितनी हसीन थीं रातें जो तड़पते हुए गुज़ारी थीं तुम न मानो मगर यही सच है मुझसे ज्यादा तो वे तुम्हारी थीं। थपथपाता था द्वार जब कोई आ गईं तुम, गुमान होता था उन दिनों कुछ अजीब हालत थी जागता भी न था, न सोता था। भोर आए तो यों लगे मुझको वह तुम्हारा सलाम लाई है दिन जो …

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कहीं तुम पंथ पर पलकें बिछाए तो नहीं बैठीं – बालस्वरूप राही

कंटीले शूल भी दुलरा रहे हैं पांव को मेरे‚ कहीं तुम पंथ पर पलकें बिछाए तो नहीं बैठीं! हवाओं में न जाने आज क्यों कुछ कुछ नमी सी है डगर की ऊष्णता में भी न जाने क्यों कमी सी है‚ गगन पर बदलियां लहरा रहीं हैं श्याम आंचल सी कहीं तुम नयन में सावन बिछाए तो नहीं बैठीं! अमावस की …

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जिंदगानी मना ही लेती है – बालस्वरूप राही

हर किसी आँख में खुमार नहीं हर किसी रूप पर निखार नहीं सब के आँचल तो भर नहीं देता प्यार धनवान है उदार नहीं। सिसकियाँ भर रहा है सन्नाटा कोई आहट कोई पुकार नहीं क्यों न कर लूँ मैं बन्द दरवाज़े अब तो तेरा भी इंतजार नहीं। पर झरोखे की राह चुपके से चाँदनी इस तरह उतर आई जैसे दरपन …

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जीवन क्रम – बालस्वरूप राही

जो काम किया‚ वह काम नहीं आएगा इतिहास हमारा नाम न दोहराएगा जब से सपनों को बेच खरीदी सुविधा तब से ही मन में बनी हुई है दुविधा हम भी कुछ अनगढ़ता तराश सकते थे दो–चार साल समझौता अगर न करते। पहले तो हम को लगा कि हम भी कुछ हैं अस्तित्व नहीं है मिथ्या‚ हम सचमुच हैं पर अक्समात …

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राही के मुक्तक – बालस्वरूप राही

मेरे आँसू तो किसी सीप का मोती न बने साथ मेरे न कभी आँख किसी की रोई ज़िन्दगी है इसकी न शिकायत मुझको गम तो इसका है की हमदर्द नहीं है कोई। आप आएं हैं तो बैठें जरा, आराम करें सिलसिला बात का चलता है तो चल पड़ता है आप की याद में खोया हूँ, अभी चुप रहिये बात करने …

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इस तरह तो – बालस्वरूप राही

इस तरह तो By Balswarup Rahi

इस तरह तो दर्द घट सकता नहीं इस तरह तो वक्त कट सकता नहीं आस्तीनों से न आंसू पोंछिये और ही तदबीर कोई सोचिये। यह अकेलापन, अंधेरा, यह उदासी, यह घुटन द्वार तो है बंद, भीतर किस तरह झांके किरण। बंद दरवाजे ज़रा से खोलिये रोशनी के साथ हंसिए बोलिये मौन पीले–पात सा झर जाएगा तो हृदय का घाव खुद …

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व्यक्तित्व का मध्यांतर – गिरिजा कुमार माथुर

लो आ पहुँचा सूरज के चक्रों का उतार रह गई अधूरी धूप उम्र के आँगन में हो गया चढ़ावा मंद वर्ण–अंगार थके कुछ फूल रह गए शेष समय के दामन में। खंडित लक्ष्यों के बेकल साये ठहर गए थक गये पराजित यत्नों के अन–रुके चरण मध्याह्न बिना आये पियराने लगी धूप कुम्हलाने लगा उमर का सूरजमुखी बदन। वह बाँझ अग्नि …

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न्यूयार्क की एक शाम – गिरिजा कुमार माथुर

देश काल तजकर मैं आया भूमि सिंधु के पार सलोनी उस मिट्टी का परस छुट गया जैसे तेरा प्यार सलोनी। दुनिया एक मिट गई, टूटे नया खिलौना ज्यों मिट्टी का आँसू की सी बूँद बन गया मोती का संसार, सलोनी। स्याह सिंधु की इस रेखा पर ये तिलिस्म–दुनिया झिलमिल है हुमक उमगती याद फेन–सी छाती में हर बार, सलोनी। सभी …

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मेरे सपने बहुत नहीं हैं – गिरिजा कुमार माथुर

मेरे सपने बहुत नहीं हैं छोटी सी अपनी दुनिया हो, दो उजले–उजले से कमरे जगने को–सोने को, मोती सी हों चुनी किताबें शीतल जल से भरे सुनहले प्यालों जैसी ठण्डी खिड़की से बाहर धीरे हँसती हो तितली–सी रंगीन बगीची छोटा लॉन स्वीट–पी जैसा, मौलसरी की बिखरी छितरी छाँहों डूबा ­­ हम हों, वे हों काव्य और संगीत–सिंधु में डूबे–डूबे प्यार …

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कौन थकान हरे जीवन की – गिरिजा कुमार माथुर

कौन थकान हरे जीवन की? बीत गया संगीत प्यार का‚ रूठ गई कविता भी मन की। वंशी में अब नींद भरी है‚ स्वर पर पीत सांझ उतरी है बुझती जाती गूंज आखिरी — इस उदास बन पथ के ऊपर पतझर की छाया गहरी है‚ अब सपनों में शेष रह गई सुधियां उस चंदन के बन की। रात हुई पंछी घर …

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