Great Indian Conspiracy Book Review: Dr. Praveen Tiwari

Great Indian Conspiracy Book Review: Dr. Praveen Tiwari

Publisher: Bloomsbury India
Pages: 292
Price: Rs. 374

साल 2006 के मालेगांव धमाकों के मामले के बाद पूरे देश में हिंदू आतंकवाद का मुद्दा सामने निकलकर आया। यह एक ऐसा मुद्दा था जिसने पूरे देश की नींद उड़ा दी। धमाकों के तार सिमी आतंकियों से जुड़ रहे थे, लेकिन राजनीतिक षडयंत्र के तहत इसे लेकर हिंदू आतंकवाद की थ्योरी गढ़ी गई। हालांकि बाद में सिमी आतंकियों का नार्को परीक्षण किया गया और उस परीक्षण से ये स्पष्ट हो गया कि ये धमाके उन्हीं आतंकियों ने किए हैं, लेकिन बाद में जांच की पूरी दिशा को बदल दिया गया।

बहरहाल, हिंदू आतंकवाद के नाम पर रची गई इस झूठी थ्योरी और षडयंत्र को उजागर और सामने लाने का काम करती है लेखक और पत्रकार डॉ. प्रवीण तिवारी की किताब ‘आतंक से समझौता’। ब्लूम्सबरी से प्रकाशित यह पुस्तक भगवा आतंक की थ्योरी को एक बड़ी राजनैतिक साजिश के तौर पर सामने रखती है।

क्या हिंदू आतंकवादी हो सकता है? या हुआ था ‘आतंक से समझौता (Great Indian Conspiracy)?

इस पुस्तक में पुष्टि कर्नाटक एफएसएल के पूर्व निदेशक डॉ. बी. एम. मोहन ने इस पुस्तक के लिए दिए गए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में की है। उन्होंने ये भी बताया कि किस तरह विस्फोटक रखने से, उसकी तैयारियों की बात को सिमी के आतंकियों ने नार्को टेस्ट में स्वीकार किया था लेकिन बाद में जब इस थ्योरी को बदल कर हिंदू आतंकवाद का नाम दिया गया, जिससे वो भी चौंक गए थे।

इस पुस्तक में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की मालेगांव, अजमेर शरीफ और समझौता ब्लास्ट को लेकर की गई जांच पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। ये किताब सिर्फ सवाल ही नहीं खड़े करती बल्कि एक शोध की तरह कई महत्वपूर्ण साक्ष्यों को भी प्रस्तुत करती है, जो इस ओर इशारा करते हैं कि भगवा आतंक की बात कहना एक सोची समझी रणनीति थी।

पुस्तक में मीडिया-सरकार-जांच एजेंसी की गठजोड़ को भी एक अलग नजरिए से दिखाने की कोशिश की गई है। कैसे सरकार जांच एजेंसी का इस्तेमाल एक बड़ी साजिश के लिए कर सकती है और कैसे पेड मीडिया का एक हिस्सा इस साजिश को अमलीजामा पहनाने में कारगर हो सकता है? 26/11 के मुंबई में हुए भयंकर आतंकी हमले को भी एक अलग रंग देने की साजिश थी, लेकिन ये कोशिश इतनी कमजोर साबित हुई कि राजनैतिक साजिश होने के बजाए तत्कालीन सरकार के गले की हड्डी बन गई।

इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मुस्लिम तुष्टिकरण और बीजेपी की हिंदूवादी छवि को हिंदू आतंक के तौर पर रखने की एक सुनियोजित रणनीति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। आखिर क्यों एक खास समय के धमाकों को ही हिंदू आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश की गई? इन सवालों के जवाब भी इस किताब में जानने को मिलते हैं।

खास बात यह है कि तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम की भूमिका इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा संदेह में रही। इस बात की पुष्टि पुस्तक के लिए किए गए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में तत्कालीन ज्वाइंट इंटेलीजेंस कमेटी के पूर्व डायरेक्टर डॉ. बी. डी. प्रधान ने भी की है। उनके इंटरव्यू में कई चौंकाने वाली बातें हैं जो साफ बताती हैं कि इंटेलीजेंस एजेंसीज भी किस तरह दबाव में काम करती हैं।

पुस्तक में कई सूत्रों को खोलकर रखा गया है तो कुछ की पहचान को गोपनीय रखा गया है। भगवा आतंक पर हुई राजनीति के मुद्दे पर लिखी गई पुस्तकों में ये अभी तक की सबसे शोध पूर्ण और विस्तृत किताब दिखाई पड़ती है। ये पुस्तक पाठकों को राजनैतिक साजिशों को समझने का एक नजरिया देती है। किस तरह सिस्टम का इस्तेमाल राजनैतिक फायदे के लिए किया जा सकता है का खुलासा भी इस किताब के जरिए मिलता है।

एक टेलीविजन पत्रकार के तौर पर डॉ. प्रवीण तिवारी खुद भी इन धमाकों के गवाह रहे हैं और उस अनुभव की झलक भी उनकी इस किताब में देखने को मिलती है। पुस्तक अंग्रेजी में The Great Indian Conspiracy शीर्षक से उपलब्ध है।

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