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महावीरप्रसाद सर्राफ - परोपकार की मिसाल

महावीरप्रसाद सर्राफ – परोपकार की मिसाल

स्वयंसेवी संगठन उस परोपकारी व्यक्ति से बहुत कुछ सीख सकते हैं जो 50 वर्ष पूर्व स्थापित अपने अरबों के कारोबार से अधिक अपने परोपकार के कामों के लिए मशहूर हो चुके हैं। मुंबई में शायद ही कोई होगा जो महावीर प्रसाद सर्राफ के बारे में न जानता हो जिनके परिवार का नाम शहर के हज़ारों बैंचों तथा वाटर कूलरों पर खुद है।81 वर्षीय महावीर प्रसाद के परोपकारी कार्यों को 55 वर्ष पूरे हो चुके हैं। उन्होंने पहला ट्रस्ट 1956 में स्थापित किया था। उन्होंने शुरुआत मलाड उपनगर में एक हनुमान जी का मंदिर बना कर की जहां वह जन्मे तथा पले – बढे थे।

महावीर प्रसाद को अपने पिता घनश्यामदास द्वारा गरीबों को भोजन खिलाने जैसे परोपकार के कार्यों को देख – देख कर प्रेरणा मिली। जब महावीर 18 वर्ष के ही थे, उनके पिता की मृत्यु हो गई परन्तु उनके मन में परोपकार की भावना के बीज बोन के लिए इतना साथ काफी था। उनका परिवार टैक्सटाइल कैमिकल्स का कारोबार करता था। उनके कारोबार को चाहे उतार – चढ़ाव का सामना करना पड़ा हो, उनकी परोपकारी परियोजनाएं, कभी मंद नही पड़ी क्योंकि इसके लिए उन्होंने अलग बंदोबस्त किये हुए थे।

वह बताते हैं, “मैं 5 ट्रस्ट चलता हूँ। ये ट्रस्ट मेरे माता – पिता घनश्यामदास व् दुर्गादेवी, मेरी पत्नी किरणदेवी तथा मेरे नाम पर हैं। इन ट्रस्ट्स ने काफी निवेश किया है जिनसे होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल हम परोपकार के लिए करते हैं।”

उनके नाम 19,961 बैंच, एक धर्मशाला, 97 वाटर कूलर, 1 सार्वजनिक शौचलय, बोर वैल, सामुदायिक हॉल निर्माण से लेकर प्रैशर कूकर तथा सिलाई मशीनें वितरण आदि कार्य शामिल हैं।

उन्होंने हाल ही में नानावती हस्पताल में एक ओ.पी.डी. तथा इमेजिंग सैंटर स्थापित करवाया है।

महावीर प्रसाद आशा करते हैं कि सार्वजनिक संगठनों को किए गए दान का प्रबंधन बेहतर ढंग से होना चाहिए। वह कहते हैं, “रेलवे स्टेशनों पर लगाए गए वाटर कूलर बुरी हालत में है। सरकारी संस्थाओं को दान किए गए बैंच टूट चुके हैं। अपेक्षा को संस्कृति हमारे संगठनों में गहरे पैर जमा चुकी है।”

उनके ट्रस्ट्स दान में काफी सारी चीजें देते हैं परन्तु नकद राशि का दान करने से परहेज करते हैं। महावीर प्रसाद बताते हैं, “कई सारे लोग निराश लौटते हैं जब इलाज या फीस भरने के लिए पैसों की उनकी मांग यहाँ पूरी नही होती है परन्तु नकद दान न देना हमारी नीति है। व्यक्तिगत स्तर पर दी धनराशि के उपयुग इस्तेमाल को निगरानी करना संभव नही होता। बेशक लोगों को उपयुक्त सुविधाओं की बड़ी जरूरत है इसलिए हमने स्कूल, कालेज, अस्पताल तथा क्लीनिक स्थापित किए हैं।”

महावीर प्रसाद से पूछिए की क्या परोपकार के बारे में उनके बेटों के विचार भी उनसे मेल खाते हैं तो वह उत्तर देते हैं, “बिलकुल, इस बारे में उनकी सोच भी मेरे जैसी है। मेरे बेटे तथा बहुएं परोपकार के कामों में मेरे साथ हैं और मेरे बाद भी यह काम जारी रहेगा।”

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