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Kanhaiyalal Sethia

[जन्म: 11 सितंबर 1919 - निधन: 11 नवंबर 2008] जन्म स्थान: सुजानगढ़ (राजस्थान) कुछ प्रमुख कृतियाँ: हिंदी वनफूल, अग्णिवीणा, मेरा युग, दीप किरण, प्रतिबिम्ब, आज हिमालय बोला, खुली खिड़कियां चौड़े रास्ते, प्रणाम, मर्म, अनाम, निर्ग्रन्थ, स्वागत, देह-विदेह, आकाशा गंगा, वामन विराट, श्रेयस, निष्पति एवं त्रयी राजस्थानी रमणियां रा सोरठा, गळगचिया, मींझर, कूं-कूं, लीलटांस, धर कूंचा धर मंजलां, मायड़ रो हेलो, सबद, सतवाणी, अघरीकाळ, दीठ, क-क्को कोड रो, लीकलकोळिया एवं हेमाणी विविध: भारत सरकार द्वारा 'पद्म-श्री' से सम्मानित। 'लीलटांस' के लिए राजस्थानी में साहित्य अकादेमी, 'सबद' काव्य-संग्रह के लिए राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा सर्वोच्च पुरस्कार के अलावा ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी सहित अनेक मान-सम्मान और पुरस्कारों से पुरस्कृत महाकवि के रूप में राजस्थानी के कालजयी कवि। कन्हैयालाल सेठिया समग्र का चार खण्डों में प्रकाशन श्री जुगलकिशोर जैथलिया के संम्पादन में हो चुका है।

कुँआरी मुट्ठी: कन्हैया लाल सेठिया वीर रस कविता

कुँआरी मुट्ठी: कन्हैया लाल सेठिया वीर रस कविता

War has an important role in Nation building. A nation that has not experienced war becomes weaker. War ensures peace. This is the perspective on war provided by the well-known poet Kanhaiyalal Sethia. युद्ध नहीं है नाश मात्र ही युद्ध स्वयं निर्माता है, लड़ा न जिस ने युद्ध राष्ट्र वह कच्चा ही रह जाता है, नहीं तिलक के योग्य शीश …

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पीथल और पाथल: कन्हैयालाल सेठिया की महाराणा प्रताप पर राजस्थानी वीर रस कविता

Kanhaiyalal Sethia Rajasthani Classic Poem about Rana Pratap पीथल और पाथल

You may have read Shyam Narayan Pandey’s classic epic “Haldighati”. Three excerpts from that great work are available on this site. Many readers had asked me to include a Rajasthani classic poem on the same theme by the great poet Kanhaiyalal Sethia, but I could not find that poem any where. Fortunately one reader Prof. Anil Bhalekar sent me excerpts …

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